Friday, 2 December 2011

मैं मर के पूछता हूँ अपने मौत की वजहें
बुजुर्ग कहते हैं तेरा सवाल अच्छा था
समझ का फेर है आंसू और हँसती आँखें
जमाना लाख कहे अदाकर अच्छा था
उम्र भर साथ चलने का भरम पाला तू ने
घडी दो घडी को ये ख्याल अच्छा था
रौशनी देने की चाह अँधेरा न बना दे तुझको
उनसे मिले बिना तो अपना भी हाल अच्छा था
- अभिषेक ठाकुर

बिन मुड़े ही जिस शख्स ने तोड़े रिश्ते
मैं अब भी उसके लौट आने के इंतजार में हूँ
इस शहर की भीड़ में खो चुका खुद को
मकां के घर में बदल जाने के इंतजार में हूँ
अभी से उसके बारे में बोल दूं कैसे?
... उसके नकाबों के उतर जाने के इंतजार में हूँ
जिस समन्दर ने मेरी कश्ती को डूबो रखा है
उसी समन्दर के उफ़न जाने के इंतजार में हूँ
मैं उनके इश्क में जाने कब का मिट भी चुका
जो कहते हैं तेरे गुजर जाने के इंतजार में हूँ
जिन दरख्तों के साथ बचपन का नाता हो
कैसे कह दूं कि उनके ढह जाने के इंतजार में हूँ
अब के बच्चों ने सवाल करना छोड़ दिया
किसी मासूम से सवाल के इंतजार में हूँ
- अभिषेक ठाकुर

Monday, 28 November 2011

अक्सर तुम मुझसे कहा करती थी
सब कुछ बदल जाता है
वक़्त की आंधी उड़ा देती है सब कुछ
लेकिन आकर देखो प्रिय
मैं अब भी वैसा ही हूँ
कुछ बनाने की कोशिश में
घर के बर्तन अब भी टूटा करते हैं
भूखे पेट सो जाता हूँ चुपचाप
तुम्हारा नाम उखड़े प्लास्टर के बीच
अब भी वैसा ही चमका करता है
तुम्हारे हाथों के निशान
अब भी मुझे देखा करते हैं
घडी की सुइयों में
वक़्त को  खोजते हुए.
  -अभिषेक ठाकुर
जिंदगी बिना बनावट के मैं गुजारूँ कैसे
खुदाया मेरे यार को दुकानों से प्यार ज्यादा है
वो मेरे जज्बात समझने कि कोशिश भी कर नहीं पाते
मेरे उस्तादों को लिखावट से प्यार ज्यादा है
क्यूँ ना खुद को छुपा कर ओढ़ लूं चेहरे
जब सारी दुनिया को सजावट से प्यार ज्यादा है
ये सारे इंतजाम बस धरे रह जायेंगे
मेरी नींदों को थकावट से प्यार ज्यादा है
- अभिषेक ठाकुर
अस्पताल के बिस्तर से
धूप पूरी नहीं दिखा करती
दिन का होना
तो बस मरीजों की भीड़ से पता चलता है
सफ़ेद दीवारों से टकरा कर रंग
बिखर बिखर से जाते हैं
बिस्तर पर तुम्हे सोचता हूँ
और दवाइयों से आधी खुली आँखों
तुमको खिड़की के पार खोजा करती हैं
तुमने सफ़ेद कपडे पहने होंगे शायद
इसलिए धूप भी अब सतरंगी नहीं लगती
- अभिषेक ठाकुर
कुछ रास्ते
सिर्फ हम दोनों को तय करने थे
रोते, झगड़ते
एक दूसरे को खींचते
किनारे लगे बबूल के काँटों को
अपने चलने का सबूत देते
लेकिन,
लेकिन अब हमने छोड़ दिया है
एक दूसरे को सहारा देना
और बाँट लिए हैं
बबूल अपने हिस्से के
- अभिषेक ठाकुर
पुरानी बेंच पर हाथ फिराना
कुछ अजीब सा लगता है
अनगढ़ ढंग से उकेरे नाम
मानो चेहरे पर पड़ी झुर्रियों कि तरह
मिटना ही नहीं चाहते
और उन अनबोले किस्सों कि तरह
बस याद दिलाना जानते हैं.
- अभिषेक ठाकुर
बिस्तर के कोने में सिमटकर
गिरा दिए हैं मैंने पहरे सारे
कुछ धुंधला सा चल रहा है कहीं
मन में शायद
पहचानने की कोशिश करता हूँ
रंग, बिम्ब, व्यक्ति, और प्रतीक
अधजगी आँखें कुछ देख नही पातीं
अतीत धुंधलाता जाता है
हाथ भीगे से लगते हैं पसीने से
तुमको छूने की कोशिश नहीं करता
जली दाल की गंध नथुनों से टकरा कर लौट जाती है
बिस्तर के कोने में सिमटा
देखो मैं जग गया हूँ
बिन सोये ही.
- अभिषेक ठाकुर
समेटता नहीं हूँ
कमरे में फैली किताबें
कोने में टंगे कपड़ों
पर चढ़ चुकी है धूल की चादर
लिखना छोड़ चुका हूँ
वीणा के तार कस देता हूँ कभी कभी
उंगलियाँ सरगम भी भूल गयीं हैं
बांसुरी होंठों को कड़वी लगती है
बहुत फूंकने पर भी
तुम्हारे नाम के अलावा कुछ और निकलता ही नहीं
वीणा के तार झंकृत हो जाते हैं अक्सर रातों को ही
हवा अक्सर मुझे सोचने का बहाना दे देती है
अब भी तुम्हारे गीतों में मेरा नाम आता है
- अभिषेक ठाकुर
स्ट्रीट लैम्प के कोनों से
टपक रही हैं बारिश की बूँदें
पीली रौशनी से भीग कर
कुछ बूँदें पीली हो गयी हैं
मेरे चेहरे की तरह
बगल के होर्डिंग पर
टंग गया है किसी कार का विज्ञापन
घर के पिछवाड़े में लगे पेड़ को
मरोड़ रही है अमरबेल
पेड़ की पत्तियां नाच रहीं हैं
अब भी
बारिश में भीगे कपड़ों को
निचोड़ रहा हूँ जिन्दगी की तरह
दूर पार्क में कुछ बच्चे
खेल रहे हैं फ़ुटबाल
हाथ बढ़ाकर महसूस
कर रहा हूँ बारिश को
पर समझ नहीं पाता
एक बूँद जाने कितने अर्थ
समेटे हुए है
- अभिषेक ठाकुर
सैलाब की खुशबू
भर रही है नथुनों में
पिछली बार
पासपोर्ट बनवाते हुए
चक्कर लगाए थे अनगिनत
वो क्षोभ अब भी सुलग
रहा है सब में
वन्दे मातरम
चिल्लाते मेरी उम्र के लोग
देखे थे सिर्फ स्कूलों में
इन आँखों में चमक रहे हैं
फिर से कुछ सपने
आपात काल कब देखा है मैंने
बस किताबों में पढ़ा था
आजादी की लड़ाई को
पहली बार
देख रहा हूँ
लोगों को ऐसे बहते
मन के किसी कोने में
उम्मीद का पौधा उग आया है
जाने कहाँ से
निकल आया हूँ फिर से सड़कों पर
रौशनी के वास्ते
- अभिषेक ठाकुर
नयी कोपलें उग आई हैं
उस नीम में
बेकार समझ कर
पिछली गर्मी में काट दिया था जिसे
हाँ वही नीम
फिर से उठ रहा है
अपनी नन्हे हाथों से
कोशिश कर रहा है फिर से
तुम्हारी छत की उचाईयों के पार जाने की
उसकी शाखें घेर लेंगी तुम्हें
और उसकी पत्तियां छा जाएँगी
तुम्हारे घर पर
उस एक क्षण
तुम कितने छोटे हो जाओगे
और कितनी छोटी हो जाएगी तुम्हारी कुल्हाड़ी
- अभिषेक ठाकुर
कुछ क्षण चुरा लिए हैं
मैंने अपनी जिंदगी से
पर सिलसिलेवार नहीं रख पाया हूँ
तुम्हें
पहेली की टुकड़ों की तरह
बंट गया है
तुम्हारा चेहरा उन क्षणों में
तुमसे प्यार पहले हो गया था
और तुम्हारा मिलना
छूट चुका है
कहीं पीछे
अभी तलाश में हूँ
उन क्षणों के
मेरे मोहल्ले के बूढ़े पीपल की तरह
गुजर जाने से इंकार कर चुके है
वो क्षण
रोज नयी यादों
को जन्म दे रहे हैं
- अभिषेक ठाकुर
धुएं के छल्लों से
लिखने की कोशिश में हूँ
अपना नाम हवा में
हर बार
मात्रा नहीं लगा पाता
पहला अक्षर मिट गया था
अंतिम लिख पाने के पहले ही
तुम झूठ कहते हो ना
काला धुआं भी कहाँ
टिक पाता है देर तक
- अभिषेक ठाकुर
क्या है ये ?
प्रारंभ एक उत्सव का?
या तैयारी एक नई लड़ाई की ?
आज की रात नहीं है
सोने की
फिर से उमड़ रहे हैं
बादल
तैयार हैं बूंदें
फिर से बरस जाने को
आँखें मानने को कब तैयार होती हैं
ऐसी जीत
सवाल बाकी हैं अभी भी कुछ
सवाल होंगे भी आगे
पर आज रात सूरज
चमक रहा है सर पर
और अँधेरा छुप कर कांप
रहा है लोगों की चमकती आँखों से
- अभिषेक ठाकुर
बरसात भिगो रही है
गड्ढों में पड़ी सड़क को
मुंडेर पर बैठी गौरैया
छिप नहीं पाई थी
बच्चे भूखे होंगे शायद
चंद चावल के दाने
जो बिखेरे थे मैंने
उसके आने के पहले ही
गायब हो चुके हैं
गुलमोहर की छोटी छोटी
पत्तियां हिल भी नहीं रहीं हैं
अब तो
पी जाना चाहती हैं
हर इक बूंद को
कॉफ़ी में मिला दी थीं
कुछ बूंदें बारिश की
और देख रहा हूँ भीगते
खम्भों को
- अभिषेक ठाकु
कुछ खोज रहा था मैं
कुछ सपने
जिन्हें मैंने बचपन में देखा करता था
कुछ अपने
जिनके साथ जीने का वादा था
कुछ अनगढ़े से तराने
जिन्हें मैं अकेले में गुनगुनाया करता था
आज मैंने पढ़ ली है कुछ किताबें
और सीख ली है दुनियादारी
और सिर्फ मेरा होना भीड़ का हिस्सा हो गया
और अब
और अब तो
सपने तो सिर्फ बच्चे ही देखते हैं
और अपने पुरानी कहानियों का हिस्सा हो चुके हैं
- अभिषेक ठाकुर
तुमको पाने और
खो देने की संभावनाओं के बीच
तुम और मैं
खो गए हैं कहीं
रोज गढ़ लिया करते हैं
कुछ नए स्वप्न
यकीन दिलाया करते हैं
खुद को
आगत भविष्य का
जहाँ स्याह रंग की जरुरत न हो
वक़्त की थपकियाँ
सुलाती नहीं
जगा देती हैं अब तो
सूरज बात नहीं करता
बस झांक लिया करता है
रोशनदान के सीखचों से
तुम्हें पाने और
खुद को खो देने की संभावनाओ के बीच
कैक्टस फिर से कहीं बड़ा न हो जाये
- अभिषेक ठाकुर
हमारे शहरों के बीच की दूरी
बढ़ गयी है हमारे दिलों में
पर जाने क्यूँ
नक्शों में
रोज ही देखा करता हूँ
तुम्हारे शहर का नाम
खोज लिया करता हूँ
तुम्हारी मोहल्ले के
आस पास के किसी
धुंधलाते प्रतीक को
रोज शाम ढ़लने तक
मन में छिपे असंख्य रास्तो में
एक बार दोहरा लेता हूँ
तुम्हारे घर तक पहुँचने वाले
रास्ते को
क्या देख पाई थी तुम कभी
तुम्हारे पास होने पर
अनायास आ जाने वाली
मुस्कराहट को
तुम्हारे घर का रास्ता भी
तुम्हारी तरह अजनबी
हो रहा है
- अभिषेक ठाकुर
हमारे गांवों के बीच
बहती नदी का पुल
इस बार बाढ़
बहा नहीं पाई थी
किनारे पर लगे
ताड़ के पेड़
अब भी इंतजार में
तुम्हारे स्पर्श के
नदी ने छुपा लिया है
हम दोनों का नाम
जो लिखा था तुमने यूँ ही
उस पेड़ को काट दिया गया है
बैरकों के वास्ते
जो हम दोनों ने मिल कर लगाया था
वो नदी जिसने हमें बड़े होते देखा था
मिट गयी हैं कहीं
और हम दोनों के बीच
आ खड़े हुए हैं दो राष्ट्र
- अभिषेक ठाकुर
तुम्हारे चारो ओर
अपनी बाँहों का घेरा नहीं डालना चाहता मैं.
देख पाओगी तुम स्वप्न
सिर्फ अपनी ही आँखों के
तुम्हारे आँगन के बेल
बढ़ पाएगी अपनी ही सहारे
और तैयार करेगी जमीन
उन पौधों के लिए
जिन्हें हम दोनों ने उगाना चाहा था
पिछली बरसात में
लो हटा दिया है मैंने अपनी बाहों का घेरा
और बन गया हूँ समय
जो बिना तुम्हें घेरे
तुम्हारी सांसों के साथ बढ़ता जाएगा
- अभिषेक ठाकुर
तुम्हारी दिखावटी शालीनता से
झांक लिया करती है
तुम्हारी लिजलिजी आँखें
रोजमर्रा के तुम्हारे शब्द
बता जाते हैं हकीक़त
तुम्हारी सोच की
प्रेम की बात करते हुए भी
तुम्हारे शब्द इशारा कर देते हैं शरीर की ओर
शरीर तक सीमित तुम्हारा मन
कभी पहुँच न पाए मेरे अस्तित्व के
और वृत्तों तक
मेरी कविताओं की प्रशंसा करते तुम
अजीब से लगते हो
जब बिना मुझे समझे
कर रहे होते हो मेरी हंसी की तारीफ
पर इसके परे मैं हूँ
जहाँ तक पहुँच नहीं पाया अब तक कोई
इसीलिए रच देती हूँ रोज नयी कविता
अपने स्वप्नों की तरह
- अभिषेक ठाकुर
तुम्हे खुद से जोड़ना कब चाहा था मैंने
बस जुड़ गया था
न जाने क्यूँ
तुमसे अजीब सा रिश्ता
उसे नाम देने की कोशिश
पूरी नही हो पाई है अब तक
मांदल की थाप में
सुनाई देने लगता है तुम्हारा ही नाम
और मादकता से भर जाया करती हैं
सारी स्वर लहरियां
पहाड़ों के दिन की तरह
हमारे मिलने का वक़्त
जल्दी ढल जाया करता है
और छा जाया करता है
मिथ्या विरह का अंधकार
इस अंधकार की
चांदनी में बरस रही होती हो तुम
अंगीठी से उठते धुंए के जरिए
तुम्हारा स्पर्श पहुँच जाता है मुझ तक
मेरी डायरी में लिखे नाम से
देखा करती हो न मुझे सोते हुए
सच कहूँ
अब अंतर नहीं कर पाता
तुम्हारे पास और दूर जाने के बीच
भी घट रही होती हो न
तुम ही
- अभिषेक ठाकुर
तुम्हारे सारे जवाबों के बीच
मेरे वो सवाल
जो कर नही पाया था
मैं तुमसे
अब भी तैरा करते है
हवाओं में
विदा के क्षण
दोहरा लिया करते खुद को
हम दोनों की आँखों में
पर इन सवालों और अनकहे
जवाबों के बीच
शायद तुम्हे पता न हो
खो दिया है
हम दोनों ने बहुत कुछ
- अभिषेक ठाकुर
रात के इन क्षणों में से
बचा लिया है मैंने खुद का इक कोना
जहाँ पहुँच पाते हैं
सिर्फ सपने मेरे
तुम्हारे सो जाने पर
जग जाया करती है
मेरी डायरी चुपचाप
और जाने क्या
उकेरा करती हूँ अपनी कल्पना में
उन बातों को
जो सुन नही पाते तुम
बोल दिया करती हूँ
अपनी कविताओं में
आँखों से गिरे मोती
छुप जाया करते हैं
दो पंक्तियों के बीच
अपनी कार की तरह
क्या तुम संभाल पाओगे
मेरे बचपन की नन्हीं चूड़ियों को
माफ़ करना तुम्हारी तरह
सीख नहीं पाई हूँ
हिसाब-किताब
इसीलिए रिक्शेवाले को
दे दिए थे कुछ पैसे ज्यादा
रोज मांग नहीं पाती
बूढ़े नौकर से हर पैसे पर पर्ची
इस सर्वस्व समर्पण के बाद भी
कुछ बच गया है मेरे पास
जो दे नहीं पाई हूँ तुम्हें
जो सहमत नहीं हो पाता
तुम्हारी बहुत सी बातों से
बच गया है
मेरे अंदर का कोई कोना
जहाँ से जन्म लिया करती है
अजन्मी कविता
- अभिषेक ठाकुर
दुनियावी ग़मों से बचने के लिए
मैंने खड़ी की एक दीवार,
अपने चारों तरफ,
और अंधेरों के साथ उजाले आने भी बंद हो गए,
मेरा भरम मजबूत हुआ
कि जीत लिया है मैंने गमों को
अब सिर्फ मैं था
सिर्फ मैं
हँसता , अपनी जीत का जश्न मनाता और
अपने आसूओं को अपनी हंसी क़ी शक्ल में छुपाता
बाहर का दर्द अब नहीं आता मेरे पास
पर फिर न जाने कहाँ का दर्द मेरे पोर पोर से रिसने लगा है |
- अभिषेक ठाकुर
वर्ष के अट्ठारह दिन
सजा लेते हो
मेरे रूप की ही मूर्ति
और बाकि दिन छूट
जाती हूँ मैं तुम्हारे बहुत पीछे
जब तुम्हारी पंचायतें
के फैसलों से जोत दी जाती हूँ
बैलों की जगह
आसानी से साबित कर दी जाती हूँ
कुल्टा और डायन
इज्जत के नाम पर घर के लोग ही
छीन लेते हैं जीने का हक
मेरे जन्म लेने पर भी
पाबंदी लगा देते हो तुम
सर्वभूतेषु का मंत्र जपते तुम
तय करते हो मेरा चरित्र
मेरे कपड़ों के आधार पर
उन मूर्तियों के सामने ही
जला दी जाती हूँ
दहेज़ के लिए
वो अट्ठारह दिन भी
तुम संभाल कब पाए हो
सही अर्थों में
तभी तो
वैदेही और पांचाली के सवाल
पर चुप हो जाती है सभा
और खड़े कर दिए जाते हैं
अलग अलग मानदंड
सिर्फ मेरी ही खातिर
समझ नहीं पाती
देवी की जय बोलते
तुम्हारे होंठ
कैसे सवाल उठाने लगते हैं
मेरे मनुष्य होने पर ही
- अभिषेक ठाकुर
जमीन, जंगल ,नदी
सब मैं ही तो था
हजारों सालों से नदी
मेरी उम्र की तरह
बरसात में चढ़ती उतरती थी
इन दरख्तों पर पड़ी सिलवटें
मेरे चेहरे की झुर्रियों की तरह ही तो थीं
इन्ही से लिपटकर सो जाता था चुपचाप
जंगल बस देते जाते थे
तुमने उस से माँगा ही कब
तुमने उजाड़ डालें जंगल
मोड़ डालीं नदियाँ
वो दरख़्त मुझसे पहले ही मर गया है
ये चंद सडकें तुमने मेरे लिए ही बनायीं थीं ना
लो में जंगल छोड़ कर इन्ही सड़कों पर रहा करता हूँ
- अभिषेक ठाकुर
भोर का तारा
दिखा नहीं है अभी
ढक लिया होगा नन्हे बादलों ने
हवा में फैली जलते टायर की गंध
आ रही है कहीं पास से ही
आज फिर एक रात काट दी होगी
किसी ने
ठण्ड से बिना सोये ही
सामने के घर का रसोईघर
रोज जाग जाता है
दिन के जागने से पहले ही
रोटियां पकातीं चूड़ियों की आवाज
कर रही होती है तैयारी
किसी को काम पर भेजने की
काले घेरों से घिरी आँखें
खुल जाती हैं
कई बार देर हो जाने के डर से
सूरज के बिना उगे ही
जाने कितने घरों में
ढल जाया करती है
दोपहर
- अभिषेक ठाकुर
झूठ कहते हो तुम
नहीं मरे होगे
भूख से
दिल्ली मैं बैठ कर
रोज ही तो बहस होती है
तुम्हारी भूख पर
स्टूडियों में लिपे पुते चेहरे
खेला करते हैं
तुम्हारी भूख के आंकड़ों के साथ
इतन सारा चावल तो सड़ गया था ना
बिना तुम्हारे खाए ही
तुम्हारे घर तक नहीं पहुँच पाई है
अभी उजाले की चमक
लालटेन की रौशनी में
गुम हो जाते हो
दीवार के ताम्बई रंग के साथ
भूख से मरे नही होगे तुम
पर शायद
जिन्दा नही रह पाए होगे
बर्बाद हुई फसल
और बिना चुकाए कर्ज के साथ
- अभिषेक ठाकुर
सारे मौसम लगे नए-नए से हैं
ख़ुशी के फेर में खुद से ही खो गए से हैं
अब तो नींद भी आ कर नहीं डसती
ख्वाब सारे डर के कहीं सो गए से हैं
ये वक़्त की कैसी आंधी गुजर गयी मुझ पर
...तमाम दोस्त भी लगे अजनबी से हैं
इस से ज्यादा अपनी तन्हाई का बयान कैसे करूँ?
मेरे हमसफ़र साए भी मुझसे डरे डरे से हैं
सारे मौसम लगे नए-नए से हैं ....................
- अभिषेक ठाकुर
प्रेम व्याप्त है
हम दोनों के अनबोलेपन के बीच
समझ नहीं पाया हूँ इसे
अपरिचित भाषा के संगीत की तरह
गूंजा करता है
दोहरा लिया करता हूँ जिसे
बिना समझने की कोशिश किए
पर तुम्हारे न होने पर
घर की दीवारें अजनबी हो जाया करती हैं
और घिर जाती है रात जल्दी ही
- अभिषेक ठाकु
परिचित चेहरों के बीच
खुद को अपरिचित पाना
और तलाश करना
नए क्षितिजों की
जहाँ से मिल सकें
उड़ने का नया अन्तरिक्ष
क़दमों को ढ़ोने की जगह
खेल सकूँ बचपन के खेल
जब खाली कर दूं
सारी जेबें
भरने को अनगढ़ पत्थर
थिरक पाऊँ
बांसों से आती आवाज पर
और वक़्त मिटा पाए
मेरे होने का निशान
बहुत सारे सपनों के बीच
क्या देख पाई हो तुम
स्वपन मेरी आँखों के
- अभिषेक ठाकुर
पति और पुत्र के लिए
भूखी रहती तुम
दे देती हो अपने हिस्से की जिंदगी
रिश्तों को
कभी नही लड़ा है कोई
यमराज से तुम्हारी उम्र के लिए
आधा पेट रह कर बाँट देती हो
उठ जाते हैं लोग
बिना देखे तुम्हारी थाली की ओर
निर्जला रहने पर भी
सब कुछ चलता रहता है
सुबह से शाम तक वैसा ही यंत्रवत
पपड़ाए होंठों से दुआ करती तुम
ताजा हैं अभी पीठ पर बेल्ट के निशान उतने ही
तुम्हारी मुक्ति का चाँद नही उगा है अभी
दूर ढक रखा है उसे
असमानताओं के बादलों ने
- अभिषेक ठाकुर
आकाश की ऊंचाई से देख कर
तुमने समझ लिया
लो रच दी है मैंने नयी सृष्टि
पर मैं रच नहीं पाता
शायद बस देख पाता हूँ
और उधार के अक्षरों और वर्णमाला
से बना देता हूँ कुछ अनगढ़ सा
क्षमा करना
समय के अनंत पथ
का सिमित यात्री हूँ
मैं
- अभिषेक ठाकुर
बेवफ़ा होने पर भी तुझे जानने का भरम तो था
इस अजनबीपन के साथ कैसे तुझे बयान करूं?
शामें जल्दी और जाड़े की उफ़ ये लम्बी रातें
चलूँ किसी अँधेरे को सूरज का फिर बयान करूँ
मेरी बर्बादियों में तेरा जिक्र तो आएगा
अहदे वफा के साथ झूठ का कैसे बयान करूं?
कुछ यादें सीने में ही रह जायें तो अच्छा है
तेरे मकाँ का सिर्फ नज्मों में बयान करूं
जिन राहों पे कभी साथ चलने की ख्वाहिश गोया
उन्ही रास्तों पे तन्हा क़दमों का बयान करूं
- अभिषेक ठाकुर
विदा का आलिंगन
मीठा नही था इस बार
फिर से मिलने की उम्मीद
तोड़ दी है हम दोनों ने
पर सब कुछ टूट कहाँ पता है
ऐसे जुड़ जाने के बाद
तुम्हारे सिरहाने रखी होगी
मेरी तस्वीर वैसे ही
मेरे खतों को बंद कर दिया होगा
तुमने अपने बक्से मैं
और धुधंला जाते होंगे
हर रोज कुछ शब्द
तुम्हारे गिरते आंसुओं के साथ
पड़ जाती होगी चीनी
ज्यादा अपने आप ही
और महसूसती होगी
मुझे
उस मीठेपन के साथ
जो मेरे प्याले से निकल कर
समा गया है तुम में
मौसम के साथ दीवारों के
बदलते रंग से बेखबर
सो रहा है तुम्हारा नाम
ठिठुरती ठण्ड में
तुम्हारे बुने स्वेटर
आ जाते हैं मुझे घेरने अब भी
और तुम्हारे हिस्से की शाम
ढल जाती है मेरे ही मोहल्ले में
हरसिंगार के फूल
महका करते हैं अब भी तुम्हारी ही तरह
और रोज लिख दिया करता हूँ
उनसे तुम्हारा नाम बगीचे में
सुबह नही हो पाती तुम्हे देखे बिना
और जागा करता हूँ
अजनबी आवाजों के साथ
सब कुछ टूट नहीं पाया है अब तक
पर देखो टूट चुकें हैं
हम दोनों ही
- अभिषेक ठाकुर
स्त्री विमर्श पर लिख दिए
जाने कितने लेख
सेमिनारों में बोला
करते थे घंटों
परम्पराओं की धज्जियाँ उड़ाती
आवाज
गूंजती रहती थी कानों में देर तलक
और एक दिन
उनके व्यस्त कार्यकर्मों से दूर
उनके घर की ही औरत मर गयी बीमारी से
रसोई में उनके लिए रोटियां पकाते
- अभिषेक ठाकुर
समाज पचा नही पता
चंद जिन्दा लोगों को
मार देता है किसी न किसी बहाने
और एक दिन उनकी कब्र को
घोषित कर दिया जाता है तीर्थ स्थान
जिन्दों को मार कर अक्सर ही पैदा
कर दिए जाते हैं
नए भगवान्
- अभिषेक ठाकुर
अनगढ़ पत्थरों को
भगवान बनाने का
हुनर छोटा होता होगा
तुम्हरी बने मूर्ति
रोज पूरी कर देती है
जाने कितनों की इच्छाएं
पर तुम्हारी एक भी इच्छा पूरी नहीं हो पाई है
अब तक
सड़क किनारे पड़ी तुम्हारी झोपड़ी
अब भी सूरज और बरसात का स्वागत किया करती है
तुम्हारा बेटा स्कूल नहीं जाता
पत्थरों को ढ़ोया करता है
और छेनी और हथोड़े के साथ
अब भी तुम्हारे हाथ
गढ़ते रहते हैं
दूसरों की
इच्छाओं का भविष्य
- अभिषेक ठाकुर
जीत की ख़ुशी के बीच
कुछ सच आ नहीं पाते बाहर
बचे रह जाते हैं अब भी
थोड़े आंसू
कुछ टूटे हुए घर
और कुछ खोये हुए
इन्सान
- अभिषेक ठाकुर
तुम्हारे पैरहन से निकले कुछ रंग
सोख लिए थे
मेरे जिस्म की रंगत ने
जिन्हें हर रोज
जिंदगी निचोड़ लिया करती है
मेरे अस्तित्व से
और मैं कोने में खड़ा
इंतजार करता रहता हूँ
डूबने और भीग जाने का
- अभिषेक ठाकुर
आंसू व्यक्त नहीं कर पाते
कुछ जज्बातों को
आँखें भीग नही पातीं अब
पर शुष्क ह्रदय की भाषा
अक्सर हो जाती है दुरूह
और
चुभने लगती है कानों को
सच्चाइयों से रूबरू करवाती
आईना दिखाती
निस्वार्थता का सबक
सिर्फ एक को
याद रहने से
प्रेम अक्सर ही बन जाता है
गुलामी
- अभिषेक ठाकुर
जाने कब
समय की कीमियागिरी ने
तुम्हारी डायरी के पन्नो को बदल
डाला है तुम्हारे चेहरे में
पर इस चेहरे से लड़ नहीं पाती अब
जिद्द नही कर पाती तुम्हारे हर्फों से
पर सब कुछ बदलने का हुनर वक़्त
सीख नहीं पायेगा कभी
हर बहते आंसू के साथ
मैं सिमट जाती हूँ
तुम में ही
- अभिषेक ठाकुर
देवदार के पेड़ों के बीच की
पगडण्डी का खोना
डराया नहीं करता था
पर आस पास
उग आये हैं
बबूल के जंगल
बीहड़ों में भटकता
रास्ते अजनबी
लगने लगे हैं
तुम्हारी भाषा की तरह
हवाओं से मौन
तिरोहित हो चुका है
जाने कब का
बहता पिघला शीशा
मारता नही
जन्म देता है बस
अनंत यंत्रणाओं को
पर इनसे गुजर कर
फिर से कुंदन नहीं
होऊंगा मैं
इस हानि लाभ
और मूल्य बढ़ने की गणित
से दूर
शायद मैं जान पाऊँ
बिना मूल्य
का अस्तित्व
- अभिषेक ठाकुर
खुबसूरत आँखें
सुनहरी रंगत
मांसल शरीर
एक जोड़ा स्तन
रोटी पकाते हाथ
और निगाहों से घूरी जाती देह
उनके हिसाब से
लिख दिया है
सब कुछ
मेरे अस्तित्व का
- अभिषेक ठाकुर
घर से निकले कच्चे रास्ते
खो जाया करते थे
खेतों के बीच
नंगे पैरों के साथ
खेत से गुजरते
खो जाने का डर
पास भी नहीं आया कभी
बिना रौशनी के
गाँव में
देर शाम तक
हर हाथ तैयार था
घर पहुँचाने को
पर जाने क्यूँ
पक्के सीमेंट
के रिश्ते और रास्ते
जोड़ नही पाते खुद को
और घर के बगल की गली
में ही गुजरते हुए
अक्सर भूल जाता हूँ
अपना मकान
- अभिषेक ठाकुर
अपने समंदर होने से अब तो थक चूका हूँ मैं
दरिया से कहो आ कर बरस जाये मुझ पर
इतनी ज्यादा रौशनी और शब होती ही नहीं
सूरज से कहो अब तो ढल जाये मुझ पर
इतना वक़्त बीत चूका , और अभी ये शादाबी
...बिना मर्जी के कैसे उम्र गुजर जाये मुझ पर
मेरे हर दर्द पे उफ़ ये उसकी हमदर्दी
यूँ वो अपनी अदाकारी दिखाए मुझ पर
कैसे चुप रहूँ और मुस्कुराऊं यारों?
गम जब हद से भी ज्यादा गुजर जायें मुझ पर
- अभिषेक ठाकुर
मरना सिर्फ खबर है
रोज के अख़बारों में
जिसे अक्सर नही पढ़ा करता मैं
पेड़ों के कटने के साथ
कहीं हिसाब नही रखा जाता
उन अनगिनत घरौदों का
जो मिट गये पेड़ के साथ ही
कहीं गिनती नही होती उस भविष्य की
जो बचे रहते हैं
सिर्फ अतीत के सपनों के रूप में
घरों के सामने का खालीपन
सिर्फ कुछ दिन ही याद रहता है
आदत डाल लेते है हम
बिन गौरैयों के जीने की
मरने के खबरों की तरह
हमने सुनना छोड़ दिया है
और ऊँची कर ली है
अपनी अपनी दीवारें
- अभिषेक ठाकुर
मैंने सोचा था
बुन लूँगा एक घर
अपने और तुम्हारे खातिर
मेरे सपनों के ईटों से
दीवाल पूरी तो हो गयी है
पर तुम्हारे सपनों का रंग
चढ़ नही पाया है अब तक
घर नही बुन पाया मैं
पर देखो ना
कब्र को भी लोग
मकान का नाम दे देते हैं
- अभिषेक ठाकुर
हमने वादा किया था
अलग हो जायेंगे एक दूसरे से
बिना आंसू बहाए
सिर्फ सपनों में देखा करेंगे
एक दूसरे को हँसते रोते हुए
पर विदा की राहों पर
लगा दिए गए हैं कंटीले तार
जाति, धर्म और हैसियत के नाम पर
जो कस गया है
एक दूसरे को थामे हमारे हाथों पर
और हवा में घुलने लगी है ताजे खून की महक
पर घबराना मत प्रिय
जमीन और पानी में मिलने के बाद
ये खोज नहीं पाएंगे हम दोनों को अलग अलग
डरना मत प्रेम से डरे हुए इन लोगों से
इनकी कुल्हाड़ियाँ
जो सिर्फ मिटाना जानती है
और कुछ चौपालें तय किया करती हैं
सांस और इज्जत की कीमत
कुछ बीज बच जायेंगे हर बार
और हमारे लहू से संचित होकर
ढक लेंगे एक दिन
सारी कायनात को
- अभिषेक ठाकुर
तुम नहीं लिखा करती
उन रातों के बारे मैं
जो गुजर जाया करतीं थी
कोई पुरानी ग़जल गुनगुनाते
एक दूसरे का हाथ थामे
जब शाम का ढ़लता सूरज
थोड़ा और चमकीला हो जाया करता था
और कहानी पढ़ती तुम्हारी आँखें
भीग जाया करतीं थीं अपने आप
पार्क के बिखरे बेंचों पर
सुनाई दिया करती थी
तुम्हारी उजली हंसी
और जो हावी हो जाया करती थी
कमरे के पीले बल्ब की रौशनी पर
माफ़ करना
तुम्हारी नज़र से दुनिया
नहीं देख पाता मैं
और न ही सीख पाया हूँ
लोगों को मोहरे समझना
तुम्हारी कहानी के पात्रों
को जिन्दा रखने के लिए
अब भी लिखा करता हूँ मैं
- अभिषेक ठाकुर
तुम्हें आगोश में समेटकर
अक्सर ही आ जाता है
ख्याल
समय को बांधने और रोक देने को
कोशिश की है बस इस पल में
जी लेने की तुम्हारे साथ
पर तुम में उतर नही पाता कभी
परिधि को छू कर लौट आने की
प्रक्रिया
तुम होती जाती हो मंथर और शांत
बाँट दिया गया है दिन और रात को
बस संध्या के कुछ क्षणों की खातिर
अनंत प्रतीक्षा को स्वीकार कर लिया है दोनों ने
सूरज की तरह अकेले जलने की पीड़ा भोगता मैं
हैरान हो जाता हूँ
जब मेरे ही ताप को ज़ज्ब करके
बरसाया करती हो तुम उन्हें चांदनी रातों मैं
स्वाति की गिरती बूंदों को समेत लेनो दो सीपियो को ही
मुक्त हो जाने दो उन्हें भी
समेटना मत
इस से पहले कि कीमत तय हो मोतियों कि
खो जाने देना उन्हें सागर में
और भावनाओं के पर्वत से उतरते हम
डूब जाएं उन सीपियों के साथ
शिखर से उलट
जहाँ सिर्फ एक के खड़े होने कि जगह हो
हम दोनों बना सकें मिलन कि तस्वीर
सिर्फ हम दोनों के रंगों के साथ
जहाँ अलग अलग होना सिर्फ अपूर्णता हो
और एक होना बना सके एक नयी यात्रा का पथ
और मेरा हाथ थामना
नीली लकीरें न खींच पाए
तुम्हारे हाथों पर
- अभिषेक ठाकुर

Wednesday, 23 November 2011

नाकामी के तमाम सुबूत धुल गए कल रात 
मैं उसके सीने पर सर रखकर खूब रोया था 
इस फसल के सुख जाने का दर्द मरने जैसा है 
इन पेड़ों के साथ ही तो सपना बोया था 
मुझे अपनेपन का सुबूत न दे डर सा लगता है 
तमाम उम्र मैं अपनों के बीच ही तो खोया था 
कच्ची नींद और उम्र ने जगा दिया उसे वक़्त से पहले ही  
वो देर रात ही तो इस सड़क पर सोया था 
खुद को ही खो दिया ख्वाब के उस टूटे टुकड़े की खातिर 
जो तेरी गली में सोते जागते संजोया था                                                  -अभिषेक ठाकुर 

Tuesday, 15 November 2011

कुछ कहानियाँ पूरी नहीं हो पातीं

आज ना जाने क्यूँ ये बारिश रुकने का नाम ही नहीं ले रही है ? ऑफिस का इतना सारा काम पड़ा है पर ये गिरती बूँदें , ऐसा लगता है जैसे इन बूंदों से कोई गहरा नाता हो , जब भी बारिश देखती हूँ मेरे अंदर कुछ भर सा जाता है | ४ साल हो गए इस शहर में आये हुए पर अभी भी ये उतना ही अजनबी लगता है जैसा पहली बार प्लेटफ़ॉर्म पर उतरते हुए लगा था , कितना लड़ना पड़ा था यहाँ आने के लिए , परिवार, रिश्तेदार यहाँ तक की पडोसी भी , उनकी नज़रों में तो बड़ा शहर जैसे कोई अँधा कुआं था और मैं जान बूझ कर उस में गिरने वाली थी | उस वक़्त तो आँखों में बस अपनी नयी जिंदगी के सपने थे , उम्मीद थी कि अब कम से कम में अपनी अलग पहचान बना पाऊँगी | बाबूजी ने तो घर से निकलते हुए कुछ कहा भी नहीं था पर चश्मे के भीतर से झांकती उनकी आँखों को मैं कभी भूल ही नहीं पाती | शुरू शुरू में तो इस शहर कि तेज रफ़्तार में मैं मीलों पीछे छुट जाती थी | घर से कॉलेज और उसके बाद जीने कि जद्दोजेहद और कुछ सोचने का मौका ही नहीं देती थी और एक दिन आईने में गौर से देखने पर पता चला कि वो चार साल पहले की अर्पिता कहीं गुम हो चुकी थी | पता ही नहीं चला कब इस शहर ने मुझे अपने हिसाब से ढाल लिया | कॉलेज ख़त्म होने के बाद जल्दी ही नौकरी भी मिल गयी थी ,सोचा था पहली तनख्वाह सीधे ले जा कर माँ के हाथ में रख दूंगी पर माँ ने तो पहले ही कह दिया बेटीअब अपने लिए घर ले ले , कब तक यूँ ही किराये के घर में रहेगी? ज्यादा वक़्त नहीं लगा ऑफिस से लोन पास होने में और कुछ वक़्त बाद ही इस शहर में सर छुपाने के लिए मुझे खुद की जगह मिल गयी | पर इन सबके बीच बहुत कुछ अधूरा सा लगता है , पिछली बार जब माँ यहाँ आई थी तो कितना कहने पर भी उसने अपने लिए कुछ नहीं लिया | कभी कभी डर लगता है कहीं मैं भी माँ की तरह तो नहीं हो रही हूँ ना , प्रिया वैसे भी कहती रहती है ये क्या हमेशा उदास रहा करती है तू ? पर जिस मर्ज का पता मुझे खुद ना हो उसका मैं प्रिया को क्या जवाब दूं?
इन यादों को वक़्त ने ना जाने कहाँ कैद कर के रख दिया था पर आज की बारिश उन सब किनारों को तोड़े दे रही है और यादें पिघले लोहे की तरह मेरी नसों को जला देना चाहतीं है | ये माया भी ना कोई काम ठीक से नहीं करती पता नहीं कॉफ़ी पाउडर कहाँ रख दिया है ? सोचा था कॉफ़ी पीने से सर का दर्द कुछ तो कम होगा, इन चार सालों ने इतना दर्द भर दिया है की सर दर्द की गोलियां भी असर नहीं करतीं | बारिश अभी भी रुकी नहीं है और और अब तो हवा भी चलने लगी है | अपार्टमेन्ट के बाहर खड़े नीम के पेड़ की पत्तियां जैसे बारिश का उत्सव सा मना रही हों , ये पेड़ अक्सर नानी के आँगन के नीम के पेड़ की याद दिला देता है , वो पेड़ जिससे बचपन की ना जाने कितनी यादें जुडी हैं | ऐसा क्यूँ होता है कि बुरी यादें भी दर्द देती हैं और अच्छी यादें तो दर्द के साथ तडपाती भी है और ये तड़प दर्द से भी बुरी है , ठीक से जीने ही नहीं देती | हर गर्मी कि छुट्ठी में हम लोग नानी के यहाँ जाते थे और जब माँ ही मेरे और भैया में भेद करती हो उस वक़्त नानी का स्नेह अजूबा सा लगता था , उनके सामने में जिद्दी हो जाया करती थी और भैया मुझे चिड़ाने के लिए अक्सर उनकी गोद में बैठ जाया करता था और उस वक़्त मुझे सच में लगता था कि काश नानी सिर्फ मेरी होतीं |
उनकी हाथों का स्पर्श मेरे लिए माँ के स्पर्श से भी ज्यादा सुखद था पर | कॉलेज में थी मैं जब बाबूजी ने फ़ोन करके कहा था कि नानी अब नहीं रहीं , कितना रोई थी मैं उस दिन , उनसे मिलना तो अब हो नहीं पता था पर लगता था कि उनका हाथ अब भी मेरे सर पर वैसे ही है , परीक्षाएं होने कि वजह से मैं अभागी तो उनके अंतिम दर्शन भी ना कर पाई | उस दिन लगा जैसे मेरे सर पर अब किसी का साया ही नहीं बचा |
पर जिंदगी रूकती कहाँ है वो तो दरिया कि तरह बस बहती जाती है और भले ही मैं जी न रही हूँ पर सासें तो आ जा रहीं हैं ना |
हाँ दरिया ही तो है ना जिंदगी और मैं उस दरिया पे पड़े कंकड़ की तरह बस बहती जा रही हूँ , ऐसा कंकड़ जिसके होने पर उसका ही वश नही है , अगर वश होता तो यूँ जिंदगी मुझे अपने साथ बहा नहीं पाती और ना ही खुशियाँ मेरे दरवाजे पर सिर्फ दस्तक दे कर ही लौट जातीं | बारिश फिर से तेज होने लगी है और बारिश से बचने के लिए एक नन्ही सी चिड़िया मेरे बालकनी के एक कोने में सिमटी हुई है , बचपन में कितने सपने देखे थे चिड़िया बन कर मुक्त गगन को छूने के पर अब लगता है की मुक्ति तो बस एक भरम थी | जितना ऊँचा उड़ते जाओ तनहाइयाँ और अकेलापन उतना ही बढ़ता जाता है और बचपन में सपने देखते समय मुझे कहाँ पता था कि मैं उड़ तो पाऊँगी पर तमाम सफ़र मुझे अकेले ही तय करना पड़ेगा | आज तो जैसे दर्द से भरे पुराने पन्ने एक के बाद एक मेरी आँखों के सामने आ रहे हों | अजीब है ना दर्द का रिश्ता भी , हंसी कि तरह ये भी लोगों को कितनी आसानी से जोड़ देता है और जैसे हर गिरते आंसू के साथ बीच का अजनबीपन मिटता जाता हो | इसी दर्द का तो साझा था ना रवि के साथ , ऑफिस के पहले ही दिन उसके हंसी के पीछे का दर्द जाना पहचाना सा लगा | रवि के अनाथ होने कि बात तो मुझे बहुत बाद में पता चली पर उसकी आँखों में मुझे अपना ही अतीत दिखाई देता था | उसकी झलकने को तैयार आँखों ने जैसे ज़माने भर का दर्द समेट रखा हो ,इस साझे दर्द ने हम दोनों को एक दुसरे के बहुत करीब ला दिया न जाने कब वो मेरी जिंदगी का हिस्सा बन गया और मुझ सदा सदा की वंचिता को ईश्वर ने जैसे सब कुछ दे दिया हो | बस मन करता था उसके आगोश में सिमटकर उसे सुनती रहूँ और उसे अपने प्यार से इतना भर दूं कि रवि के अंदर दर्द समाने के लिए कोई कोना ही ना बचे | अपने माथे पर उसके होंठों कि पहली छुअन ने सारे किनारों को तोड़ डाला और मैं उसके सामने फूट फूट कर रो पड़ी थी , उस वक़्त रवि ने कुछ नहीं कहा सिर्फ मुझे अपने आगोश में समेट लिया था , मैं उस से लिपटी न जाने कितनी देर तक रोती रही थी उसकी हाथ अपने हाथों में पकड़े रहने मुझे यकीन दिलाता था कि जिंदगी ने मेरे हिस्से में भी कुछ खुशियाँ लिख हुईं थीं |
पर इंसान ये खुशियाँ भी कहाँ संभाल पाता है ? रवि जितना मेरे करीब आ रहा था उस से बिछड़ने का डर मन के किसी हिस्से को हमेशा घेरे रहता था | अपनी खोई खोई आँखों का उसे मैं क्या जवाब देती? कैसे कहती कि जब सिर्फ अंधेरों कि आदत हो तो हल्की सी रौशनी भी दिल को बेचैन कर देती है | पर इन सबके बीच रवि के लिए तो दुनिया ही मुझसे शुरु होती थी , मेरे इर्द -गिर्द उसकी बाँहों का कसाव मेरे हर दर्द को मानो निचोड़ लेना चाहता हो | मुझे अपने सीने से चिपकाये हुए न जाने कितनी बार उसने मुझे बिखरने से बचाया था | उसका साथ धीरे धीरे सब कुछ बदलने लगा था , पहली बार सावन ने मुझे रुलाया नहीं था , उसके करीब होने का एहसास अधेरों पर भारी पड़ने लगा था और जीवन में पहली बार मैंने देखा था कि तसवीरें सिर्फ स्याह ही नहीं होतीं उनमें रंग भी होते हैं ,चटख रंग | मेरे जन्मदिन पर रवि ने मुझे ऑफिस जाने ही नहीं दिया और उसी दिन मैंने जाना कि इस भागते शहर कि जिंदगी का एक दूसरा पहलू भी है और इस शहर में भी बहुत से शहर और गाँव बसते हैं | रवि का हाथ थामे समंदर किनारे चलने का एहसास , उसके हाथों की गर्माहट , सब कुछ एक सपना ही तो था | रवि के साथ सूरज डूबते हुए देखते वक़्त लगा कि मेरी जिंदगी में गमों का अँधेरा अब कभी नहीं होगा , मेरा सर उसके कंधे पर था और समंदर किनारे की हवा एक सिहरन सी पैदा करती थी , उस रात जब वो मुझे घर छोड़ कर वापस जा रहा था , मुझे लगा जैसे कोई मुझसे मेरा होना ही छीन रहा हो | वो सारी रात तो आँखों आँखों में ही गुजर गयी | रवि अब मेरे अस्तित्व का हिस्सा बन चुका था , जिसके सामने मैं खुल कर रो सकती थी , जिसके साथ होने पर किसी और की तमन्ना नहीं होती थी | मैंने कितनी बार उससे कहा था की उसका ये प्यार मुझे डराता है और बदले में वो सिर्फ हंस देता था | कितनी उजली हो गयी थी उसकी हंसी लेकिन उसकी आँखें अब भी वैसी ही लगतीं थी भरी भरी | और मेरा दिल उन आँखों में भरा हुआ प्यार देख सकता था , सोचा था कि उसके गम बाँट कर उसे खुशियों से भर दूंगी पर रवि तो सिर्फ मुझसे मेरे गम बांटता था |
लेकिन मेरे लिए इन गमों को बांटना इतना आसान कहाँ था , जिससे जख्मों पर मरहम रखने की उम्मीद थी उस वक़्त ने ही उन्हें नासूर में बदल दिया था | इस से पहले बस छली ही तो गयी थी मैं, कितना वक़्त लगा था रवि को अपने गमों का और उन जख्मों का साझेदार बनाने में जो जिंदगी ने मुझे तोहफे में दिए थे | रवि से वही तो बाँट सकती थी ना जो मेरे अंदर बेहिसाब भरा हो , उस दिन मेरी आवाज मेरा ही साथ नहीं दे रही थी और मेरे अश्क मुझे अपने गमों को बहा देने का मौका दे रहे थे | अक्सर यही तो होता है ना जो मेरे साथ उस दिन हो रहा था अँधेरा आने पर सबसे पहले परछाई ही साथ छोड़ जाती है | और कुछ देर बाद तो मेरे पास शब्द ही नहीं बचे थे , जिंदगी के बाकि पन्नों को तो मेरी हिचकियों ने ही रवि तक पहुँचाया था | उस दिन रवि कि आँखें मानो मुझे छुपा लेना चाहतीं हों , पहली बार लगाकि पुरुष का ये रूप कितना सुखकर होता है | उसकी हथेलियों ने मेरे सर को ढक लिया था , ऐसे में वक़्त का होश ही कहाँ था मुझे ? शाम को जब उठी तो पता चला कि रवि की हथेलियों ने मुझे अभी भी वैसे ही घेर रखा है | उस दिन रवि ने कुछ नहीं कहा पर उसकी मौजूदगी ही मेरे मन को संबल दे रही थी | उस दिन के पहले तो रवि कभी कभी मुझसे लड़ लिया करता था पर अब लगता था जैसे मेरी हर सोच , हर इच्छा में ही उसकी रजामंदी हो | जिसके विचारों और आंकाक्षाओं की कभी कोई कीमत ही नहीं रही हो उसके लिए तो ये सब एक अनहोनी ही थी |
बारिश भी अब रुक गयी है , बचपन में सोचती थी कि हर साल बादल इतने सारे आंसूं कहाँ से ले आते हैं ? ऐसा कौन सा गम है जो इन बादलों को भी यूँ बरसने पर मजबूर कर देता है ? पर आज जाना कि इस में इन बादलों का कोई कसूर नहीं , वो तो बेचारे कभी धरती से मिल ही नहीं पाते और कैसा महसूस करते होंगे वो जब क्षितिज का भरम न उन्हें मिलन का उत्सव मानाने देता होगा और ना विरह का विलाप ही करने देता होगा |
अब समझ पायी थी कि जब भाग्य ने ही तन्हाई का शाप दे दिया हो तो कैसा महसूस होता होगा उन बादलों को , कुछ यथार्थ भोगे बिना कहाँ समझ में आते हैं? आठवीं कक्षा में पढ़ी गुनाहों का देवता की सुधा का दर्द मैं कहाँ समझ पाई थी और न ही ये समझ पाई थी कि अपनी बीवी कि तस्वीर अपने गले में लटकाए घूमने वाला मेरे मोहल्ले का वो आदमी रात भर किसे बुलाया करता था | उस समय तो माँ ने यही बताया था कि वो आदमी अपनी बीवी कि मौत के गम में पागल हो गया था | लेकिन जिस वाकये को गुजरे इतना समय बीत हो गया वो आज मुझे क्यूँ याद आ रहा है? मन ने पासा फेंका तेरी आँखें भी उसी आदमी कि आँखों कि तरह दिखने लगी हैं , ओफ्फ़ ! क्या हो रहा है मुझे ? मेरे लाख ना चाहने पर भी चेहरा अपने आप आईने कि तरफ मुड़ गया | छोटे से आईने में बाल सवांरते देख कर रवि ने कहा था इतने छोटे से शीशे में तुम तो पूरी दिखती भी नहीं हो और जिद करके उसी दिन ये आईना मुझे दे कर गया था | अक्सर कोने में पड़ी कुर्सी पर बैठ कर वो मुझे बाल सवांरते हुए देखा करता था , उसके आगोश में सिमट जाने के अनगिनत पलों का साक्षी रहा है ये आईना , एक पल को लगा जैसे रवि वहीँ कुर्सी पर बैठा मुस्कुरा रहा है और अभी उठ कर अपनी बाहें फैला देगा | ऐसा लगता है जैसे मेरे दिलोदिमाग के साथ मेरे घर के हर कोने में रवि ही भर चुका हो , माया ने तो कितनी बार कहा कि घर कि सफाई कर दीजिये पर डरती हूँ कि कहीं सफाई कि वजह से रवि कि यादों कि धूल भी गायब ना हो जाये |
ये यादें भी कितनी अजीब हैं ना दरिया कि तरह आने का कोई ना कोई रास्ता खोज ही लेतीं हैं , तभी तो लगता है कि रवि उस पौधे कि पत्तियों में समाया है जो उसने मेरे घर में लगाया था , रवि अभी भी उस आईने से झांक रहा हो और जैसे कॉफी मग पर उसकी उँगलियों की छुअन अब भी उतनी ही ताज़ी हो | अपार्टमेन्ट के बहार जिंदगी फिर उसी तेजी से भागने लगी है और फिर से वही गाड़ियों का शोर कानो को परेशान
करने लगा है पर इस में इन बेचारों का क्या दोष , अब तो अपनी सबसे पसंदीदा गजलें भी सुन कर लगता है कि कानों में कोई पिघला शीशा उड़ेल रहा हो |
गमों ने इतनी शिद्दत से मुझसे मुहब्बत की है
खुशी गर दर से भी गुजर जाये तो डर लगता है
जिन दरख्तों ने सिर्फ सूखा ही देखा हो ताउम्र
बारिश की बूँद भी पड़ जाये तो डर लगता है
जिनके इंतजार में ये आँखें सोयीं ही नहीं
उनके आने की खबर लग जाये तो डर लगता
मुझे ज़माने से यूँ तो कोई शिकवा नहीं
पर बात जब मुस्कुराने की आ जाये तो डर लगता है
- अभिषेक ठाकुर
एक दुनिया
जो गढ़ ली गयी है
विचारों और कल्पनाओं में
हकीक़त के सात रंग
पहुँच तो पाते हैं
तुम्हारी आँखों पर
पर जाने क्यूँ तुम देख नहीं पाती
स्याह अंधेरों के पार
काले रंग से पुते तुम्हारे हाथ
दबा दिया करते हैं
हंसी के उजालों को
दो और दो चार का गणित
लागू नहीं हो सकता
संबंधों और रिश्तों की
गर्माहट पर
सतत संघर्ष से दूर
बहुत कुछ बचा है अभी
जो खोज रहा होता है खुद को
और मिटा डालता है खुद को
सतरंगी उजालों के लिए
- अभिषेक ठाकुर
समय नहीं बीता करता
मानदंड बदल गये हैं
तुम्हारे होने के बाद
समय निरपेक्ष था ही नहीं कभी
... खेला करता है नित खेल अक्सर
तुम्हारे पास होने पर घंटे क्षणों में बदल जाया करते हैं
और तुम्हारे बिना रातें बन जाती हैं अनंतता का पर्याय
पर इस अनंत यात्रा को पकड़ने की कोशिश
दे देती है जन्म अहंकार और मोह को
यकीन करो साथी
समय बस अलग अस्तित्वों को ही छू पाता है
प्रेम हमेशा से रहा है
कालातीत

- अभिषेक ठाकुर

परिधि

तुम्हें आगोश में समेटकर
अक्सर ही आ जाता है
ख्याल
समय को बांधने और रोक देने को
कोशिश की है बस इस पल में
 जी लेने की तुम्हारे साथ
पर तुम में उतर नही पाता कभी
परिधि को छू कर लौट आने की
प्रक्रिया
तुम होती जाती हो मंथर और शांत
बाँट दिया गया है दिन और रात को
बस संध्या के कुछ क्षणों की खातिर
अनंत प्रतीक्षा को स्वीकार कर लिया है दोनों ने
सूरज की तरह अकेले जलने की पीड़ा भोगता मैं
हैरान हो जाता हूँ
जब मेरे ही ताप को ज़ज्ब करके
बरसाया करती हो तुम उन्हें चांदनी रातों मैं
स्वाति की गिरती बूंदों को समेत लेनो दो सीपियो को ही
मुक्त हो जाने दो उन्हें भी
समेटना मत
इस से पहले कि कीमत तय हो मोतियों कि
खो जाने देना उन्हें सागर में
और भावनाओं के पर्वत से उतरते हम
डूब जाएं उन सीपियों के साथ
शिखर से उलट
जहाँ सिर्फ एक के खड़े होने कि जगह हो
हम दोनों बना सकें मिलन कि तस्वीर
सिर्फ हम दोनों के रंगों के साथ
जहाँ अलग अलग होना सिर्फ अपूर्णता हो
और एक होना बना सके एक नयी यात्रा का पथ
और मेरा हाथ थामना
नीली लकीरें न खींच पाए
तुम्हारे हाथों पर
- अभिषेक ठाकुर

Saturday, 22 October 2011

अनकहा प्रेम

प्रेम व्याप्त है
अनकहे शब्दों
और अनसुने जज्बातों के साथ
हम दोनों के अनबोलेपन के साथ
बह कर चला आता है फिर भी
घर से निकलने पर घेर लेता
दुआ बन कर
समझने की कोशिश
पूरी नहीं हो पाई है अब तक
तुम्हे जान भी नहीं सकता कभी
ज्ञाता और ज्ञेय का भेद
जन्म दे देता है दो अलग अस्तित्वों को
पर अजनबी भाषा के संगीत की तरह
तुम समा रही हो मुझ में
बिना समझे, बिना जाने
जुड़ गया है रिश्ता कोई
पर तुम्हारे न होने पर
तुम ही देखती हो दीवारों पर अपना नाम
और शाम ढल जाया करती है जल्दी ही
                   - अभिषेक ठाकुर

Friday, 7 October 2011

आँख उठाते रहे हैं हम

यूँ बारिशों का लुत्फ़ उठाते रहे हैं हम
पांव दरिया में डाले आँख उठाते रहे हैं हम


उनकी मसरूफ़ियत के भी यारों क्या कहने
हाथों में जाम ले कर पिलाते रहे हैं हम


हमारे हाथ अब उस शजर को पा नहीं पाते
जिसकी शाख अपने हाथों से सजाते रहे हैं हम


वो दर्द-ए-दिल के सिवा और मुझको क्या देगा
इसी उम्मीद में खुद को कब से बहलाते रहे हैं हम


वतन की याद यूँ ही तो छूट नहीं जाती
परदेश में भी राखी मनाते रहे हैं हम


मेरे दोस्तों ने मुझे चाहा है डूबकर
इसी बहाने से दुश्मनी निभाते रहे हैं हम

                                     - अभिषेक ठाकुर

इबादतों की वजहें अलग अलग

अब प्रश्न ये है कि कौन हैं इतने सारे लोग को खुद को धार्मिक या धर्म से जोड़ रह हैं. जवाब बहुत आसान सा है.| हम वो लोग हैं जिनमें से कुछ को पैसे चाहिए, कुछ को सफलता, कुछ को शादी करवानी है , कुछ को घर बनवाना है , कुछ को अच्छे मार्क्स चाहिए , कुछ को बेटा या बेटी चाहिए या कुछ और नहीं तो पडोसी की बर्बादी ही चाहिए. या कुछ ने पैसे ज्यादा कम लिए हैं तो दान करने चला जायेगा ताकि स्वर्ग की सीट भी पक्की रहे , या पाप किये है तो उनकी माफ़ी मांग लेते हैं और नहीं कुछ बचा तो दुनिया को दिखाने के लिए ही चले जाते हैं | ये करते हैं हम मंदिर जा कर, या चर्च जा कर , या नमाज पढ़ कर | क्या धर्म इतना तुच्छ है , धर्म को साधन भी था और साधना भी पर हम लोग कुछ ज्यादा समझदार हैं ना तभी तो भगवान को रिश्वत देने को तैयार रहते हैं, जितना बड़ा काम उतनी बड़ी रिश्वत | और धर्म या मजहब के नाम पर होने वाले पाप तो बचे ही हैं , खैर सवाल बहुत हैं . पर अगली बार खुद से पूछ जरुर लीजियेगा कहीं मैं भी तो उन्ही मैं शामिल नहीं हूँ |

Monday, 3 October 2011

वक़्त के गुजरने को तलाशता हूँ



अक्सर तुम मुझसे कहा करती थी
सब कुछ बदल जाता है
वक़्त की आंधी उड़ा देती है सब कुछ
लेकिन आकर देखो प्रिय
मैं अब भी वैसा ही हूँ
कुछ बनाने की कोशिश में
घर के बर्तन अब भी टूटा करते हैं
भूखे पेट सो जाता हूँ चुपचाप
तुम्हारा नाम उखड़े प्लास्टर के बीच
अब भी वैसा ही चमका करता है
तुम्हारे हाथों के निशान
अब भी मुझे देखा करते हैं
घडी की सुइयों में
वक़्त को  खोजते हुए.
                                               -अभिषेक ठाकुर   

कोई इरादा ना था.........

यकीन मानो मैंने सिर्फ गम उकेरे थे अपने कागज पर
तेरी तस्वीर बनाने का  तो कोई इरादा ना था

पांव बढ़ते ही नही दर से ये उनकी मर्जी
तेरे दिल से न जाने का तो कोई इरादा ना था

तेरा अक्स शीशे में उतर आया होगा
ज़ाम होंठों से लगाने का तो कोई इरादा ना था

उसके अपनों ने मरने की जगह भी न छोड़ी होगी
उसका सरेराह गुजर जाने का तो  इरादा ना था

उसकी जीत पर क्यूँ ना हैरानी होगी
उसका जीत जाने का तो कोई इरादा ना था

फ़कत उसका गम बुझाने की चाह थी मेरी
गमों से ऐसे झुलस  जाने का तो इरादा ना था

ज़माने का लिहाज कर लिया होगा वरना
उनका मेरी कब्र पर आने का तो इरादा ना था

                                          - अभिषेक ठाकुर

सन्यासी

कई तरह के सन्यासी हैं हमारे भारत में, एक उस तरह के हैं जिनके लिए नारी मुई घर संपत्ति नासी मूड मूडाए भए सन्यासी वाला सन्यास है. और कुछ दूसरे नित्यानंद की तरह के | पर एक दूसरी तरह का सन्यास भी है जो आदि शंकराचार्य और विवेकानंद की तरह का है , जो केवल अपने मोक्ष की चिंता नहीं करता बल्कि बुद्ध की महाकरुणा की तरह तरह तब तक जन्म लेने में यकीन रखता है जब तक जगत क्ले हर प्राणी को निर्वाण उपलब्ध न हो जाए | और जो आपने कहा ना समझने की बात तो हाँ कई बार हम समझ नहीं पाते कि पारस ये नहीं देखता कि लोहा कहाँ का था कसाई के घर का या फिर मंदिर का वो तो बस उसे सोने में बदलना जानता है बशर्ते वो पारस ही हो. और ये उदाहरण मेरा नहीं है बल्कि विवेकानंद के जीवन कि एक घटना है जब एक दरबार में नृत्य करने वाली ने विवेकानंद को इस भजन से सायास के असली स्वरुप का ज्ञान करवाया था |
इक लोहा पूजा में रखता इक घर वधिक पड़ो
पारस गुण अवगुण नहीं चितवत कंचन करत खरो

Sunday, 2 October 2011

अभिशाप

हम दोनों ने ले लिया है
अभिशाप
नदी के दो  पाट होने का
रोज ही चला करती है नाव
हम दोनों के बीच
ताकि
उतार सकें खुशियों के यात्री
एक दूसरे के किनारों पर
तुम्हारी ओर की गौरैया
आ जाती है तिनके चुनने
मेरे  किनारों पर बैठा चकवा
बन जाता है मेरी ही आवाज
सुबह का सूरज मुझे छू कर
चला जाता है तुम्हे जगाने
और देख लिया करता हूँ
शाम तुममें डूबते हुए
अक्सर पुरवाई में
खोजा करता हूँ
तुम्हारे सांसों की महक
पर सर्दी  की रातें
कट नहीं पातीं ठिठुरते हुए
तुम्हारे किनारे पर झोपड़ी
में जलता दिया
बुझ जाया करता है
 तेल खत्म हो जाने से
मैं जानता हूँ उनकी भूख देख कर
सो नहीं पाती
तुम भी
हाँ
हम दोनों ने चुना था
दो  पाट होना
ताकि बह सके नदी
हम दोनों के बीच से
पर हमारे बीच की नदी
को मोड़ दिया जायेगा एक दिन
और रह जायेगा
सिर्फ अभिशाप
हम दोनों के बीच
            - अभिषेक ठाकुर

Saturday, 1 October 2011

ख्यालों के धागे

बया के घोसलों के मानिंद
बुन रहा था तुम्हें
मेरे ख्यालों के धागे
उलझ उलझ जाते थे
शाम का उजाला
जल्दी ढल गया था कल
धागे का एक सिरा
तुम्हारे दुपट्टे में फँस गया था शायद
या तुमने लपेट लिया होगा अपनी उँगलियों में
कई कोशिशें कर चुका हूँ मैं
अतीत के इस धागे को काट कर फेंक देने की
अभी तो बुने थे
बस चंद आंसू
बुने थे वो तारे
जो बचपन से हम दोनों के साथ थे
बुन ली थी वो नदी
जो हम दोनों के गाँव के बीच बहा करती थी
माफ़ करना तुम्हें बुन नहीं पाया अब तक
धागे का एक सिरा
फँस गया है तुम्हारे दुपट्टे में
और उँगलियों में लपेट कर
बंद कर ली है तुमने अपनी मुट्ठी                                           
                                       -अभिषेक ठाकुर

रेत

खिड़कियाँ कभी बंद नहीं करता
जाने कब तुम्हारी खुशबू
गुजर रही हो मेरे शहर से
देखा करता हूँ शाम का सुर्ख रंग
रेत पर उतरते
टीले के उस पार से
बंजारिन पुकारा करती है बूंदों को
सूखी रेत पर कल ही तो देखे थे
तुम्हारे पांवों के निशान
पर रेत ने छुपा लिया है
उन्हें अपने सीने में
अपने होठों की पपड़ाई परत पर चिपकी रेत से
पूछा करता हूँ पता तुम्हारा
तुम्हारी खुशबू नहीं आई है अब तक
लेकिन रेत भरने लगी है मेरे बिस्तर में
मैंने अब खोल दिए हैं दरवाजे भी
आरामकुर्सी पर बैठा देख रहा हूँ
फर्श पर तुम्हारा नाम लिखती रेत को
                                                - अभिषेक ठाकुर

नींद और सपने

नींद से बोझिल आँखों और
होश खोने के बीच
एक कोना अभी भी नितांत मेरा है
इस एक क्षण
कुछ कौंध सा जाता है हर रोज
अपने जालों के बीच मकड़ी
कुछ बड़ी सी लगती है
हटाए जाने की चिंता से बेखबर
फिर से बुन देगी कुछ और जाले
दीवाल पर टंगे नक्शे में रोज
खोजा करता हूँ अपने कस्बे का नाम
कैलेंडर के उड़ते पन्नो जैसे
वक़्त भाग रहा है कहीं
मेज पर पड़ा लैम्प
लड़ रहा है अकेले 'अन्ना' की तरह
जमीन पर रेंग रहे है कुछ सपने
नए शिकारों की तलाश में
अभिशप्त आत्माओं में
भटक रहे हैं कुछ नए सवाल
सब ने बत्तियां बुझा दी हैं
उनकी पुकार सुनकर
कुछ और घरों को नदी ने
लील लिया था कल
लोग नदी नहीं आसमान को देखते हैं अब
कुछ सूखे बिस्किट टपक पड़ेंगे शायद
फुटपाथ पर बन रही है रसोई
आधी कच्ची रोटियों की खुशबू
खींच लाई है चंद कुत्तों को
कोने में अब भी खड़ा सोता जागता
रिक्शे वाला देख रहा है सपना
सवारियों का और उनसे जुड़े सपनो का

                                                  - अभिषेक ठाकुर

आज़ादी के नाम

किताबों के पन्ने पलटता हूँ
इंटरनेट पर दी हैं सैकड़ों परिभाषाएं
आजादी की
रट रहा हूँ
जीने की आजादी
...मजहब की आजादी
बोलने की आजादी
समान होने की आजादी
कमर में बम लपेटे
मांग रहे हैं कुछ लोग आजादी
यहाँ की आजादी
वहां से आजादी
एक कुनैन की गोली के लिए
कल मर गया था वो बस्तर के जंगलों में
इरोम शर्मीला ने दस सालों से नहीं खाया है कुछ भी
हर शहर से मिल जाया करती है लाशें अब भी
कीमत दे रहीं होतीं है जानने की
काम नहीं है उसके पास
तोड़ता रहता है शीशे
जलाता रहता है बसें
या पिघलता रहता है खुद ही
गेहूं गाँव तक नहीं पहुंचा वापस
सड़ गया इस बरसात में कहीं
कीड़े नहीं मारे उसने दवा से इस बार
ख़त्म कर ली थी जिंदगी
उसके दोस्त पानी मांग रहे थे फसलों के लिए
बंदूकें उग आई हैं अब कपास की जगह
रट रहा हूँ परिभाषाएं अब भी
दूर कहीं लाल किले पर फहरता तिरंगा
अब भी मांगता रहता है लाल लहू
बहुतों से आज भी नहीं पाया होगा
दो जून का भोजन
राजपथ से थोड़ी दूर खड़ा भिखारी
अब भी देख रहा है तिरंगे की ओर
शांत, स्निग्ध, अविचल


- अभिषेक ठाकुर

Thursday, 29 September 2011

अतीत और वर्तमान

पत्तों की तरह
अब  भी मेरे होंठ कांप जाते हैं
कुछ कह नहीं पता
दर्द से झुकी पलकें
सोने से डरा करतीं हैं
अब भी
तुम्हारा लगाया पेड़
गिर गया है अब की बारिश में
रात अब भी वैसी ही है
छोड़ कर गयी थी तुम जहाँ
सूरज नहीं देखा मैंने तब से
तुम्हारे नाम के सिवा
कुछ लिखता नहीं अब अपनी डायरी में
सारे पन्ने भर चुके हैं तुम्हारे नाम से
बिस्तर पर सोता नहीं
इस डर से कहीं तुम्हारे जिस्म की
सिलवटें मिट न जायें बेख्याली में
आइना तुम्हारा अक्स नहीं दिखाता अब
तोड़ दिए थे कल सारे आईने मैंने
मैंने साँस लेना छोड़ दिया है
तुम जी रही हो  मेरे अंदर
सुन लिया करता हूँ
तुम्हारी सांसों की आवाज
और तुम्हारी बढती धडकनों को
                  - अभिषेक ठाकुर

सागर और नदी : एक दूसरे के लिए

जाने कब दे दिया था किसी ने 
अलग अलग नाम हम दोनों को
तुम्हारी तरह मेरे उद्गम की बात नहीं करता कोई 
तुमने गलत समझ लिया होगा 
तुम मिलती नही मुझ में
पर तुम्हारे जरिए
मैं भी देख लेता हूँ 
अपने खारेपन के परे के जीवन को 
तुम माध्यम बन जाती हो 
और ले आती हो सन्देश मेरे उन हिस्सों का
जो छूट गए हैं मुझसे
और किया करते हैं बातें आसमानों से
शहरों से निकलता कचरा ले आती हो तुम
हर बरसात के वक़्त मटमैले पानी के साथ
बहा ले जाती हो अपने किनारों पर
पड़ी गंदगी को
पर मैं
अभिशप्त हूँ
कहीं गया नहीं है वो कचरा 
जो पिछले युग छोड़ गयी थी तुम
सूरज की किरणें भी
नहीं जला पातीं उसे
रोज होते
नए अणुबमों के परीक्षणों ने
घायल कर डाला है मुझे

पर तूम तक कुछ भी
नहीं  पहुँचने दिया है मैंने
बादलों को बस दे दिया करता हूँ
अपनी शुद्धता
जो बरस कर मैदानों  में
भर दिया करते हैं तुम्हें
जो पहाड़ों में जम कर
बन जाता है गंगोत्री
देखो न हम दोनों का मिलन
जन्म दे देता है अनूठे जीवन को
साझा है ना हम दोनों का दुःख
जब मेरी ही तरह तुम्हें भी
बाँट दिया जाता है बड़े बांधों में
एक सा ही है ना
जब मेरी तरह तुम्हारी भी जिंदगी
 तौली  जाती है 
कुछ सिक्कों के आधार पर
जिन्हें हमने साथ में बड़े होते देखा है
उन्हें मार दिया जाता है बस खेल की खातिर
नासमझ हैं ना वो लोग
जो बाँट दिया करते हैं हमें
और बातें करते हैं
हम दोनों के अलग अलग
जीवन की
          - अभिषेक ठाकुर

Monday, 26 September 2011

मेरा हिस्सा

रात के इन क्षणों में से
बचा लिया है मैंने खुद का इक कोना
जहाँ पहुँच पाते हैं
सिर्फ सपने  मेरे
तुम्हारे सो जाने पर
जग  जाया करती है
मेरी डायरी चुपचाप
और जाने क्या
उकेरा करती हूँ अपनी कल्पना में
उन बातों को
जो सुन नही पाते तुम
बोल दिया करती हूँ
अपनी कविताओं में
आँखों से गिरे मोती
छुप जाया करते हैं
दो पंक्तियों के बीच
अपनी कार की तरह
क्या तुम संभाल पाओगे
 मेरे बचपन की नन्हीं चूड़ियों को
माफ़ करना तुम्हारी तरह
सीख नहीं पाई हूँ
हिसाब-किताब
इसीलिए रिक्शेवाले को
दे दिए थे कुछ पैसे ज्यादा
रोज मांग नहीं पाती    
बूढ़े नौकर से हर पैसे पर पर्ची
इस सर्वस्व समर्पण के बाद भी
कुछ बच गया है मेरे पास
जो दे नहीं पाई हूँ तुम्हें
जो सहमत नहीं हो पाता
तुम्हारी बहुत सी बातों से
बच गया है
मेरे अंदर का कोई कोना
जहाँ से जन्म लिया करती है
अजन्मी कविता
                    

Wednesday, 21 September 2011

तुम्हारे जाने के बाद


तुम्हारे जाने के बाद
कुर्सी अब भी कांप रही है
तुम्हारी आहट से
मेरे मन की तरह
पर्दों पर अब भी ताजी है
तुम्हारी छुअन
गुलदस्तों में लगे फूलों से
झांक रहीं है अब भी
तुम्हारी सपनीली आँखें
तुम्हारा झूठा प्याला
भर लिया है मैंने खुद से ही
कानो के पास सरसराती हवा में
अब भी गूंज रही है
खनक तुम्हारी हंसी की
अभी खुली नहीं है
वो गांठ जो तुमने लगा दी थी मेरे दुपट्टे में
मुझे सताने को
वो गजल अभी ख़त्म नहीं हुई
जो सुन रहे थे तुम
नज्मों की तरह गूंज रहे हो अब भी
तुम मेरे कानों में
मेरी आँखों के कोनो में अभी अटके हैं वो मोती
जो तुम्हे देख कर झलक आए थे यूँ ही
खिड़की के पास खड़ी देख रही हूँ
तुम्हें दूर जाते हुए
पर तुम्हारी तरह तुम्हारा दूर जाना भी
 भ्रम है ना
तुम दूर जाओगे और  बिंदु के जैसे
फिर से मुझ में समा जाओगे
                            - अभिषेक ठाकुर

दर्द

कभी कभी हम अपने ही दर्द और आदत के इतने आदी हो जाते हैं की उसे भी पकड़ लेने की कोशिश करने लगते हैं , तैयार ही नहीं होते आँखें खोल कर सुबह देखने के लिए | पर ये दर्द है क्या? करोड़पति न बन पाने का दुःख , या परीक्षा में ९०% न ला पाने का दुःख, या एक गाडी ही क्यूँ है इसका दुःख ? किस दर्द की बात कर रहे हैं हम ? ग्रीक विद्वानों को लगता था की नाटक  का सबसे उत्कृष्ट रूप दुखांत नाटक ही हो सकते हैं , और ये कोई खास गलती भी नहीं थी क्यूँ अगर हम गाड़ियों और बंगलों और सत्ता में सुख देखें  तो फिर सर्वं दुखम ही ज्यादा अच्छा है | तो आप किस दर्द की बात कर रही हैं मैं समझ नहीं पा रहा , हाँ बहुत सारे व्यक्ति हैं  जिनकी मूलभूत आवश्कता ही पूरी नहीं हो पाती , पर इसके जिम्मेदार कौन लोग हैं, बस एक इच्छा जो है सिर्फ मेरा है , इसलिए घेरा डाल दिया है हमने हर तरफ, मेरी जमीन, मेरे पैसे, मेरी गाडी, मेरी पत्नी, मेरे बच्चे , कोई छोटा घेरा डाल रेहा है तो कोई बड़ा, इस से कोई फर्क नहीं पड़ता की कोई एक हजार की बात कर रहा है या एक लाख की, भावना दोनों मैं एक ही है, और इसकी कोई सीमा भी नहीं है अगर सीमा जैसा कुछ होता तो कि नहीं अगर इतने पैसे आ जायें तो मैं छोड़ दूंगा धन कि लिप्सा को, पर कोई सीमा है ही नहीं, अब तो आश्रम भी घेरने में परिपक्व हो चुके हैं, जिन्हें मुक्त करना था व्यक्ति को वो अब घेर रहे हैं जमीन, गाड़ियाँ और कुछ नही तो भक्त ही या तथाकथित शिष्य ही, तुम्हारे कितने शिष्य हैं बस एक हजार , तुम छोटे  साधू हो, मुझे देखो मेरे पास १० हजार हैं और उन में विदेशी भी हैं, ये गम हैं लोगों के पास , कोई छोड़ने को तैयार नहीं है बस दर्द दर्द चिल्लाये पड़े हैं , एक छोटी सी घटना है कल कि ही, और मेरे सामने की है, भाई बहन थे , लड़की दिल्ली जा रही थी और भाई जा रहा था उसे स्टेशन छोड़ने , रास्ते में दोनों का एक्सिडेंट हुआ और लड़की के सर में चोट आई, खून बह रहा था, और वो लड़की हॉस्पिटल में अपने सर से बहता खून नहीं देख रही है वो कह रही थी की मेरा लैपटॉप तो नहीं टुटा , मेरे मोबाइल कहाँ है ?
तो आप जरा स्पष्ट करिए ऐसा कौन सा गम है दूसरों का जिसे देख कर आप दुखी होते हो, और रही बात मरघट पसंद आने की तो ये स्वाभाविक है , हम में से अधिकाश डरे हुए हैं मौत से , सबसे बड़ा डर, और उन्ही डरपोक लोगों ने  मरघट को अपवित्र और डरावना घोषित कर दिया , कि श्मशान से लौटो तो नहाओ, उधर मत जाया करो, सोचा था उन लोगों कि सारे सबूत ही मिटा देंगे तो मौत का डर आएगा कहाँ से?
पर वो भूल जाते हैं कि वो तो आनी ही है, पुराने कपडे फट जायेंगे तो बदलना तो है ही , जब हम पुराने कपड़ों से मोह नहीं रखते तो फिर ऐसा क्यूँ करना, पर हुआ उल्टा उम्र के साथ जीवन को भी अधिकांश लोग बस पकड़ लेना चाहते हैं कि बस दबोच लो , छोड़ेंगे ही नहीं जिंदगी को |

Tuesday, 20 September 2011

मैं खोज रहा हूँ

अतीत और वर्तमान की पहेलियों से दूर 
मैं खोज रहा हूँ
 अपने उगने की जमीन
तुम हिस्सा हो ना मेरे उस 'मैं' का 
खोज रहा हूँ
उन रास्तों को
जिन पर मंजिल के आने 
पर साथ छूटने का डर न हो
और न हो एक  दूसरे का गला काटते
जल्दी पहुँच जाने की इच्छा 
जहाँ तुम्हारा हाथ थामें 
बस चलते जाना हो
रिश्तों और देह की गणित से परे 
जहाँ तुम उतर सको मुझ मैं 
तुम्हारी सांसों के तेज और धीमे होने से
सुन लूं तुम्हारे मन को
मैं खोज रहा हूँ वो जंगल
 जहाँ मेरी नेमप्लेट
पलाश और जामुन 
जैसे नामों में खो  जाए
बरसात को समा जाने दूं
अपनी जड़ों में
और देख सकूँ 
ओस को 
अपने पत्तों पर नाचते हुए
बसंत आने पर फैला दूं 
अपनी बाहें 
और सोख लूं 
सरसों की खुशबू
अपने हर रोम में 
मैं खोज रहा हूँ वो घर
जहाँ सोने के लिए 
तुम नींद की गोलियां न खाओ
अपनों की ही  घूरती आँखों से दूर
जहाँ हमारी बिटिया 
बड़ी हो सके 
आँगन के नीम के साथ 
कोने पे पड़ी झाड़ू की तरह
तुम रह न जाओ
बस मांजते संवारते 
जहाँ तुम्हारे भूखे रहने पर
निगल न पाऊँ 
मैं भी कुछ
अतीत और भविष्य की 
पहेलियों से दूर
मैं खोज रहा हूँ 'खुद'  को 
                - अभिषेक ठाकुर

हम दोनों की मुक्ति

हम दोनों की मुक्ति

by Abhishek Thakur on Friday, 16 September 2011 at 11:20
मैंने इनकार कर दिया है
मुक्ति से
मेघ नहीं थे मेरे पास
बरस रहे थे
इस रेगिस्तान के पार कहीं
जो पहुंचा सकें
मेरा सन्देश तुम तक
इसलिए कर लिया था
साझा
अपने और तुम्हारे शहर
की हवाओं से
ले आया करतीं हैं
तुम्हारी खुशबू
मुझे महकाने को
कैसे सौंप दिया तुमने
मुझे उन्हें ही
मेरे घर की मुंडेर
सिर्फ मेरी कब थी भला
साथ में ही तो देखे थे
ना वो सारे स्वप्न
तारों को साक्षी मानकर
बिस्तर पर गिरे आंसुओं में
याद नहीं तुम्हे
तुम्हारा भी हिस्सा था
माफ़ करना
तुम्हारे पैराहन
का कोई रंग
लिख नही पाया हूँ अब तक
पर तुमने देखा है कभी
मेरे कमरे में पड़े अनेक कागजों पर
जाने कितने बार कोशिश की है
उन रंगों को उतारने की
अब तक उतर नहीं पाया
ये मेरी ही गलती होगी
तुम्हारी चिट्ठी
हाँ सबसे नीचे लगा रखी है मैंने
आधार है ना वो मेरे वजूद का
उसने ही सिखाया था
साँस लेने का मतलब
तुम्हारे घर की चट्टानों
पर उग आये हैं कैक्टस
पर तुमने सोचा है कभी
उनकी जड़ों को
सींचता वो लाल लहू
रोज कहाँ से आ जाता है
तुम्हारी आँखों से रौशनी
चुरा ली थी मैंने कुछ पलों के लिए
ताकि बना सकूँ एक नया शहर
तुम्हारे वास्ते
पर देखो ना
एक एक ईट चुन कर रखते
पहली मंजिल भी नहीं भी नही बना पाया अब तक
रोज मुस्कुरा लेता हूँ
तुम्हारे सामने आते ही
ताकि दे सकूँ तुम्हे
भरम अपने खुश होने का
लो मैंने इनकार कर दिया है मुक्त होने से

और प्रतीक्षारत हूँ तुम्हारा हाथ थामे
हम दोनों की मुक्ति का

- अभिषेक ठाकुर