Thursday, 29 September 2011

अतीत और वर्तमान

पत्तों की तरह
अब  भी मेरे होंठ कांप जाते हैं
कुछ कह नहीं पता
दर्द से झुकी पलकें
सोने से डरा करतीं हैं
अब भी
तुम्हारा लगाया पेड़
गिर गया है अब की बारिश में
रात अब भी वैसी ही है
छोड़ कर गयी थी तुम जहाँ
सूरज नहीं देखा मैंने तब से
तुम्हारे नाम के सिवा
कुछ लिखता नहीं अब अपनी डायरी में
सारे पन्ने भर चुके हैं तुम्हारे नाम से
बिस्तर पर सोता नहीं
इस डर से कहीं तुम्हारे जिस्म की
सिलवटें मिट न जायें बेख्याली में
आइना तुम्हारा अक्स नहीं दिखाता अब
तोड़ दिए थे कल सारे आईने मैंने
मैंने साँस लेना छोड़ दिया है
तुम जी रही हो  मेरे अंदर
सुन लिया करता हूँ
तुम्हारी सांसों की आवाज
और तुम्हारी बढती धडकनों को
                  - अभिषेक ठाकुर

सागर और नदी : एक दूसरे के लिए

जाने कब दे दिया था किसी ने 
अलग अलग नाम हम दोनों को
तुम्हारी तरह मेरे उद्गम की बात नहीं करता कोई 
तुमने गलत समझ लिया होगा 
तुम मिलती नही मुझ में
पर तुम्हारे जरिए
मैं भी देख लेता हूँ 
अपने खारेपन के परे के जीवन को 
तुम माध्यम बन जाती हो 
और ले आती हो सन्देश मेरे उन हिस्सों का
जो छूट गए हैं मुझसे
और किया करते हैं बातें आसमानों से
शहरों से निकलता कचरा ले आती हो तुम
हर बरसात के वक़्त मटमैले पानी के साथ
बहा ले जाती हो अपने किनारों पर
पड़ी गंदगी को
पर मैं
अभिशप्त हूँ
कहीं गया नहीं है वो कचरा 
जो पिछले युग छोड़ गयी थी तुम
सूरज की किरणें भी
नहीं जला पातीं उसे
रोज होते
नए अणुबमों के परीक्षणों ने
घायल कर डाला है मुझे

पर तूम तक कुछ भी
नहीं  पहुँचने दिया है मैंने
बादलों को बस दे दिया करता हूँ
अपनी शुद्धता
जो बरस कर मैदानों  में
भर दिया करते हैं तुम्हें
जो पहाड़ों में जम कर
बन जाता है गंगोत्री
देखो न हम दोनों का मिलन
जन्म दे देता है अनूठे जीवन को
साझा है ना हम दोनों का दुःख
जब मेरी ही तरह तुम्हें भी
बाँट दिया जाता है बड़े बांधों में
एक सा ही है ना
जब मेरी तरह तुम्हारी भी जिंदगी
 तौली  जाती है 
कुछ सिक्कों के आधार पर
जिन्हें हमने साथ में बड़े होते देखा है
उन्हें मार दिया जाता है बस खेल की खातिर
नासमझ हैं ना वो लोग
जो बाँट दिया करते हैं हमें
और बातें करते हैं
हम दोनों के अलग अलग
जीवन की
          - अभिषेक ठाकुर

Monday, 26 September 2011

मेरा हिस्सा

रात के इन क्षणों में से
बचा लिया है मैंने खुद का इक कोना
जहाँ पहुँच पाते हैं
सिर्फ सपने  मेरे
तुम्हारे सो जाने पर
जग  जाया करती है
मेरी डायरी चुपचाप
और जाने क्या
उकेरा करती हूँ अपनी कल्पना में
उन बातों को
जो सुन नही पाते तुम
बोल दिया करती हूँ
अपनी कविताओं में
आँखों से गिरे मोती
छुप जाया करते हैं
दो पंक्तियों के बीच
अपनी कार की तरह
क्या तुम संभाल पाओगे
 मेरे बचपन की नन्हीं चूड़ियों को
माफ़ करना तुम्हारी तरह
सीख नहीं पाई हूँ
हिसाब-किताब
इसीलिए रिक्शेवाले को
दे दिए थे कुछ पैसे ज्यादा
रोज मांग नहीं पाती    
बूढ़े नौकर से हर पैसे पर पर्ची
इस सर्वस्व समर्पण के बाद भी
कुछ बच गया है मेरे पास
जो दे नहीं पाई हूँ तुम्हें
जो सहमत नहीं हो पाता
तुम्हारी बहुत सी बातों से
बच गया है
मेरे अंदर का कोई कोना
जहाँ से जन्म लिया करती है
अजन्मी कविता
                    

Wednesday, 21 September 2011

तुम्हारे जाने के बाद


तुम्हारे जाने के बाद
कुर्सी अब भी कांप रही है
तुम्हारी आहट से
मेरे मन की तरह
पर्दों पर अब भी ताजी है
तुम्हारी छुअन
गुलदस्तों में लगे फूलों से
झांक रहीं है अब भी
तुम्हारी सपनीली आँखें
तुम्हारा झूठा प्याला
भर लिया है मैंने खुद से ही
कानो के पास सरसराती हवा में
अब भी गूंज रही है
खनक तुम्हारी हंसी की
अभी खुली नहीं है
वो गांठ जो तुमने लगा दी थी मेरे दुपट्टे में
मुझे सताने को
वो गजल अभी ख़त्म नहीं हुई
जो सुन रहे थे तुम
नज्मों की तरह गूंज रहे हो अब भी
तुम मेरे कानों में
मेरी आँखों के कोनो में अभी अटके हैं वो मोती
जो तुम्हे देख कर झलक आए थे यूँ ही
खिड़की के पास खड़ी देख रही हूँ
तुम्हें दूर जाते हुए
पर तुम्हारी तरह तुम्हारा दूर जाना भी
 भ्रम है ना
तुम दूर जाओगे और  बिंदु के जैसे
फिर से मुझ में समा जाओगे
                            - अभिषेक ठाकुर

दर्द

कभी कभी हम अपने ही दर्द और आदत के इतने आदी हो जाते हैं की उसे भी पकड़ लेने की कोशिश करने लगते हैं , तैयार ही नहीं होते आँखें खोल कर सुबह देखने के लिए | पर ये दर्द है क्या? करोड़पति न बन पाने का दुःख , या परीक्षा में ९०% न ला पाने का दुःख, या एक गाडी ही क्यूँ है इसका दुःख ? किस दर्द की बात कर रहे हैं हम ? ग्रीक विद्वानों को लगता था की नाटक  का सबसे उत्कृष्ट रूप दुखांत नाटक ही हो सकते हैं , और ये कोई खास गलती भी नहीं थी क्यूँ अगर हम गाड़ियों और बंगलों और सत्ता में सुख देखें  तो फिर सर्वं दुखम ही ज्यादा अच्छा है | तो आप किस दर्द की बात कर रही हैं मैं समझ नहीं पा रहा , हाँ बहुत सारे व्यक्ति हैं  जिनकी मूलभूत आवश्कता ही पूरी नहीं हो पाती , पर इसके जिम्मेदार कौन लोग हैं, बस एक इच्छा जो है सिर्फ मेरा है , इसलिए घेरा डाल दिया है हमने हर तरफ, मेरी जमीन, मेरे पैसे, मेरी गाडी, मेरी पत्नी, मेरे बच्चे , कोई छोटा घेरा डाल रेहा है तो कोई बड़ा, इस से कोई फर्क नहीं पड़ता की कोई एक हजार की बात कर रहा है या एक लाख की, भावना दोनों मैं एक ही है, और इसकी कोई सीमा भी नहीं है अगर सीमा जैसा कुछ होता तो कि नहीं अगर इतने पैसे आ जायें तो मैं छोड़ दूंगा धन कि लिप्सा को, पर कोई सीमा है ही नहीं, अब तो आश्रम भी घेरने में परिपक्व हो चुके हैं, जिन्हें मुक्त करना था व्यक्ति को वो अब घेर रहे हैं जमीन, गाड़ियाँ और कुछ नही तो भक्त ही या तथाकथित शिष्य ही, तुम्हारे कितने शिष्य हैं बस एक हजार , तुम छोटे  साधू हो, मुझे देखो मेरे पास १० हजार हैं और उन में विदेशी भी हैं, ये गम हैं लोगों के पास , कोई छोड़ने को तैयार नहीं है बस दर्द दर्द चिल्लाये पड़े हैं , एक छोटी सी घटना है कल कि ही, और मेरे सामने की है, भाई बहन थे , लड़की दिल्ली जा रही थी और भाई जा रहा था उसे स्टेशन छोड़ने , रास्ते में दोनों का एक्सिडेंट हुआ और लड़की के सर में चोट आई, खून बह रहा था, और वो लड़की हॉस्पिटल में अपने सर से बहता खून नहीं देख रही है वो कह रही थी की मेरा लैपटॉप तो नहीं टुटा , मेरे मोबाइल कहाँ है ?
तो आप जरा स्पष्ट करिए ऐसा कौन सा गम है दूसरों का जिसे देख कर आप दुखी होते हो, और रही बात मरघट पसंद आने की तो ये स्वाभाविक है , हम में से अधिकाश डरे हुए हैं मौत से , सबसे बड़ा डर, और उन्ही डरपोक लोगों ने  मरघट को अपवित्र और डरावना घोषित कर दिया , कि श्मशान से लौटो तो नहाओ, उधर मत जाया करो, सोचा था उन लोगों कि सारे सबूत ही मिटा देंगे तो मौत का डर आएगा कहाँ से?
पर वो भूल जाते हैं कि वो तो आनी ही है, पुराने कपडे फट जायेंगे तो बदलना तो है ही , जब हम पुराने कपड़ों से मोह नहीं रखते तो फिर ऐसा क्यूँ करना, पर हुआ उल्टा उम्र के साथ जीवन को भी अधिकांश लोग बस पकड़ लेना चाहते हैं कि बस दबोच लो , छोड़ेंगे ही नहीं जिंदगी को |

Tuesday, 20 September 2011

मैं खोज रहा हूँ

अतीत और वर्तमान की पहेलियों से दूर 
मैं खोज रहा हूँ
 अपने उगने की जमीन
तुम हिस्सा हो ना मेरे उस 'मैं' का 
खोज रहा हूँ
उन रास्तों को
जिन पर मंजिल के आने 
पर साथ छूटने का डर न हो
और न हो एक  दूसरे का गला काटते
जल्दी पहुँच जाने की इच्छा 
जहाँ तुम्हारा हाथ थामें 
बस चलते जाना हो
रिश्तों और देह की गणित से परे 
जहाँ तुम उतर सको मुझ मैं 
तुम्हारी सांसों के तेज और धीमे होने से
सुन लूं तुम्हारे मन को
मैं खोज रहा हूँ वो जंगल
 जहाँ मेरी नेमप्लेट
पलाश और जामुन 
जैसे नामों में खो  जाए
बरसात को समा जाने दूं
अपनी जड़ों में
और देख सकूँ 
ओस को 
अपने पत्तों पर नाचते हुए
बसंत आने पर फैला दूं 
अपनी बाहें 
और सोख लूं 
सरसों की खुशबू
अपने हर रोम में 
मैं खोज रहा हूँ वो घर
जहाँ सोने के लिए 
तुम नींद की गोलियां न खाओ
अपनों की ही  घूरती आँखों से दूर
जहाँ हमारी बिटिया 
बड़ी हो सके 
आँगन के नीम के साथ 
कोने पे पड़ी झाड़ू की तरह
तुम रह न जाओ
बस मांजते संवारते 
जहाँ तुम्हारे भूखे रहने पर
निगल न पाऊँ 
मैं भी कुछ
अतीत और भविष्य की 
पहेलियों से दूर
मैं खोज रहा हूँ 'खुद'  को 
                - अभिषेक ठाकुर

हम दोनों की मुक्ति

हम दोनों की मुक्ति

by Abhishek Thakur on Friday, 16 September 2011 at 11:20
मैंने इनकार कर दिया है
मुक्ति से
मेघ नहीं थे मेरे पास
बरस रहे थे
इस रेगिस्तान के पार कहीं
जो पहुंचा सकें
मेरा सन्देश तुम तक
इसलिए कर लिया था
साझा
अपने और तुम्हारे शहर
की हवाओं से
ले आया करतीं हैं
तुम्हारी खुशबू
मुझे महकाने को
कैसे सौंप दिया तुमने
मुझे उन्हें ही
मेरे घर की मुंडेर
सिर्फ मेरी कब थी भला
साथ में ही तो देखे थे
ना वो सारे स्वप्न
तारों को साक्षी मानकर
बिस्तर पर गिरे आंसुओं में
याद नहीं तुम्हे
तुम्हारा भी हिस्सा था
माफ़ करना
तुम्हारे पैराहन
का कोई रंग
लिख नही पाया हूँ अब तक
पर तुमने देखा है कभी
मेरे कमरे में पड़े अनेक कागजों पर
जाने कितने बार कोशिश की है
उन रंगों को उतारने की
अब तक उतर नहीं पाया
ये मेरी ही गलती होगी
तुम्हारी चिट्ठी
हाँ सबसे नीचे लगा रखी है मैंने
आधार है ना वो मेरे वजूद का
उसने ही सिखाया था
साँस लेने का मतलब
तुम्हारे घर की चट्टानों
पर उग आये हैं कैक्टस
पर तुमने सोचा है कभी
उनकी जड़ों को
सींचता वो लाल लहू
रोज कहाँ से आ जाता है
तुम्हारी आँखों से रौशनी
चुरा ली थी मैंने कुछ पलों के लिए
ताकि बना सकूँ एक नया शहर
तुम्हारे वास्ते
पर देखो ना
एक एक ईट चुन कर रखते
पहली मंजिल भी नहीं भी नही बना पाया अब तक
रोज मुस्कुरा लेता हूँ
तुम्हारे सामने आते ही
ताकि दे सकूँ तुम्हे
भरम अपने खुश होने का
लो मैंने इनकार कर दिया है मुक्त होने से

और प्रतीक्षारत हूँ तुम्हारा हाथ थामे
हम दोनों की मुक्ति का

- अभिषेक ठाकुर