Saturday, 22 October 2011

अनकहा प्रेम

प्रेम व्याप्त है
अनकहे शब्दों
और अनसुने जज्बातों के साथ
हम दोनों के अनबोलेपन के साथ
बह कर चला आता है फिर भी
घर से निकलने पर घेर लेता
दुआ बन कर
समझने की कोशिश
पूरी नहीं हो पाई है अब तक
तुम्हे जान भी नहीं सकता कभी
ज्ञाता और ज्ञेय का भेद
जन्म दे देता है दो अलग अस्तित्वों को
पर अजनबी भाषा के संगीत की तरह
तुम समा रही हो मुझ में
बिना समझे, बिना जाने
जुड़ गया है रिश्ता कोई
पर तुम्हारे न होने पर
तुम ही देखती हो दीवारों पर अपना नाम
और शाम ढल जाया करती है जल्दी ही
                   - अभिषेक ठाकुर

Friday, 7 October 2011

आँख उठाते रहे हैं हम

यूँ बारिशों का लुत्फ़ उठाते रहे हैं हम
पांव दरिया में डाले आँख उठाते रहे हैं हम


उनकी मसरूफ़ियत के भी यारों क्या कहने
हाथों में जाम ले कर पिलाते रहे हैं हम


हमारे हाथ अब उस शजर को पा नहीं पाते
जिसकी शाख अपने हाथों से सजाते रहे हैं हम


वो दर्द-ए-दिल के सिवा और मुझको क्या देगा
इसी उम्मीद में खुद को कब से बहलाते रहे हैं हम


वतन की याद यूँ ही तो छूट नहीं जाती
परदेश में भी राखी मनाते रहे हैं हम


मेरे दोस्तों ने मुझे चाहा है डूबकर
इसी बहाने से दुश्मनी निभाते रहे हैं हम

                                     - अभिषेक ठाकुर

इबादतों की वजहें अलग अलग

अब प्रश्न ये है कि कौन हैं इतने सारे लोग को खुद को धार्मिक या धर्म से जोड़ रह हैं. जवाब बहुत आसान सा है.| हम वो लोग हैं जिनमें से कुछ को पैसे चाहिए, कुछ को सफलता, कुछ को शादी करवानी है , कुछ को घर बनवाना है , कुछ को अच्छे मार्क्स चाहिए , कुछ को बेटा या बेटी चाहिए या कुछ और नहीं तो पडोसी की बर्बादी ही चाहिए. या कुछ ने पैसे ज्यादा कम लिए हैं तो दान करने चला जायेगा ताकि स्वर्ग की सीट भी पक्की रहे , या पाप किये है तो उनकी माफ़ी मांग लेते हैं और नहीं कुछ बचा तो दुनिया को दिखाने के लिए ही चले जाते हैं | ये करते हैं हम मंदिर जा कर, या चर्च जा कर , या नमाज पढ़ कर | क्या धर्म इतना तुच्छ है , धर्म को साधन भी था और साधना भी पर हम लोग कुछ ज्यादा समझदार हैं ना तभी तो भगवान को रिश्वत देने को तैयार रहते हैं, जितना बड़ा काम उतनी बड़ी रिश्वत | और धर्म या मजहब के नाम पर होने वाले पाप तो बचे ही हैं , खैर सवाल बहुत हैं . पर अगली बार खुद से पूछ जरुर लीजियेगा कहीं मैं भी तो उन्ही मैं शामिल नहीं हूँ |

Monday, 3 October 2011

वक़्त के गुजरने को तलाशता हूँ



अक्सर तुम मुझसे कहा करती थी
सब कुछ बदल जाता है
वक़्त की आंधी उड़ा देती है सब कुछ
लेकिन आकर देखो प्रिय
मैं अब भी वैसा ही हूँ
कुछ बनाने की कोशिश में
घर के बर्तन अब भी टूटा करते हैं
भूखे पेट सो जाता हूँ चुपचाप
तुम्हारा नाम उखड़े प्लास्टर के बीच
अब भी वैसा ही चमका करता है
तुम्हारे हाथों के निशान
अब भी मुझे देखा करते हैं
घडी की सुइयों में
वक़्त को  खोजते हुए.
                                               -अभिषेक ठाकुर   

कोई इरादा ना था.........

यकीन मानो मैंने सिर्फ गम उकेरे थे अपने कागज पर
तेरी तस्वीर बनाने का  तो कोई इरादा ना था

पांव बढ़ते ही नही दर से ये उनकी मर्जी
तेरे दिल से न जाने का तो कोई इरादा ना था

तेरा अक्स शीशे में उतर आया होगा
ज़ाम होंठों से लगाने का तो कोई इरादा ना था

उसके अपनों ने मरने की जगह भी न छोड़ी होगी
उसका सरेराह गुजर जाने का तो  इरादा ना था

उसकी जीत पर क्यूँ ना हैरानी होगी
उसका जीत जाने का तो कोई इरादा ना था

फ़कत उसका गम बुझाने की चाह थी मेरी
गमों से ऐसे झुलस  जाने का तो इरादा ना था

ज़माने का लिहाज कर लिया होगा वरना
उनका मेरी कब्र पर आने का तो इरादा ना था

                                          - अभिषेक ठाकुर

सन्यासी

कई तरह के सन्यासी हैं हमारे भारत में, एक उस तरह के हैं जिनके लिए नारी मुई घर संपत्ति नासी मूड मूडाए भए सन्यासी वाला सन्यास है. और कुछ दूसरे नित्यानंद की तरह के | पर एक दूसरी तरह का सन्यास भी है जो आदि शंकराचार्य और विवेकानंद की तरह का है , जो केवल अपने मोक्ष की चिंता नहीं करता बल्कि बुद्ध की महाकरुणा की तरह तरह तब तक जन्म लेने में यकीन रखता है जब तक जगत क्ले हर प्राणी को निर्वाण उपलब्ध न हो जाए | और जो आपने कहा ना समझने की बात तो हाँ कई बार हम समझ नहीं पाते कि पारस ये नहीं देखता कि लोहा कहाँ का था कसाई के घर का या फिर मंदिर का वो तो बस उसे सोने में बदलना जानता है बशर्ते वो पारस ही हो. और ये उदाहरण मेरा नहीं है बल्कि विवेकानंद के जीवन कि एक घटना है जब एक दरबार में नृत्य करने वाली ने विवेकानंद को इस भजन से सायास के असली स्वरुप का ज्ञान करवाया था |
इक लोहा पूजा में रखता इक घर वधिक पड़ो
पारस गुण अवगुण नहीं चितवत कंचन करत खरो

Sunday, 2 October 2011

अभिशाप

हम दोनों ने ले लिया है
अभिशाप
नदी के दो  पाट होने का
रोज ही चला करती है नाव
हम दोनों के बीच
ताकि
उतार सकें खुशियों के यात्री
एक दूसरे के किनारों पर
तुम्हारी ओर की गौरैया
आ जाती है तिनके चुनने
मेरे  किनारों पर बैठा चकवा
बन जाता है मेरी ही आवाज
सुबह का सूरज मुझे छू कर
चला जाता है तुम्हे जगाने
और देख लिया करता हूँ
शाम तुममें डूबते हुए
अक्सर पुरवाई में
खोजा करता हूँ
तुम्हारे सांसों की महक
पर सर्दी  की रातें
कट नहीं पातीं ठिठुरते हुए
तुम्हारे किनारे पर झोपड़ी
में जलता दिया
बुझ जाया करता है
 तेल खत्म हो जाने से
मैं जानता हूँ उनकी भूख देख कर
सो नहीं पाती
तुम भी
हाँ
हम दोनों ने चुना था
दो  पाट होना
ताकि बह सके नदी
हम दोनों के बीच से
पर हमारे बीच की नदी
को मोड़ दिया जायेगा एक दिन
और रह जायेगा
सिर्फ अभिशाप
हम दोनों के बीच
            - अभिषेक ठाकुर

Saturday, 1 October 2011

ख्यालों के धागे

बया के घोसलों के मानिंद
बुन रहा था तुम्हें
मेरे ख्यालों के धागे
उलझ उलझ जाते थे
शाम का उजाला
जल्दी ढल गया था कल
धागे का एक सिरा
तुम्हारे दुपट्टे में फँस गया था शायद
या तुमने लपेट लिया होगा अपनी उँगलियों में
कई कोशिशें कर चुका हूँ मैं
अतीत के इस धागे को काट कर फेंक देने की
अभी तो बुने थे
बस चंद आंसू
बुने थे वो तारे
जो बचपन से हम दोनों के साथ थे
बुन ली थी वो नदी
जो हम दोनों के गाँव के बीच बहा करती थी
माफ़ करना तुम्हें बुन नहीं पाया अब तक
धागे का एक सिरा
फँस गया है तुम्हारे दुपट्टे में
और उँगलियों में लपेट कर
बंद कर ली है तुमने अपनी मुट्ठी                                           
                                       -अभिषेक ठाकुर

रेत

खिड़कियाँ कभी बंद नहीं करता
जाने कब तुम्हारी खुशबू
गुजर रही हो मेरे शहर से
देखा करता हूँ शाम का सुर्ख रंग
रेत पर उतरते
टीले के उस पार से
बंजारिन पुकारा करती है बूंदों को
सूखी रेत पर कल ही तो देखे थे
तुम्हारे पांवों के निशान
पर रेत ने छुपा लिया है
उन्हें अपने सीने में
अपने होठों की पपड़ाई परत पर चिपकी रेत से
पूछा करता हूँ पता तुम्हारा
तुम्हारी खुशबू नहीं आई है अब तक
लेकिन रेत भरने लगी है मेरे बिस्तर में
मैंने अब खोल दिए हैं दरवाजे भी
आरामकुर्सी पर बैठा देख रहा हूँ
फर्श पर तुम्हारा नाम लिखती रेत को
                                                - अभिषेक ठाकुर

नींद और सपने

नींद से बोझिल आँखों और
होश खोने के बीच
एक कोना अभी भी नितांत मेरा है
इस एक क्षण
कुछ कौंध सा जाता है हर रोज
अपने जालों के बीच मकड़ी
कुछ बड़ी सी लगती है
हटाए जाने की चिंता से बेखबर
फिर से बुन देगी कुछ और जाले
दीवाल पर टंगे नक्शे में रोज
खोजा करता हूँ अपने कस्बे का नाम
कैलेंडर के उड़ते पन्नो जैसे
वक़्त भाग रहा है कहीं
मेज पर पड़ा लैम्प
लड़ रहा है अकेले 'अन्ना' की तरह
जमीन पर रेंग रहे है कुछ सपने
नए शिकारों की तलाश में
अभिशप्त आत्माओं में
भटक रहे हैं कुछ नए सवाल
सब ने बत्तियां बुझा दी हैं
उनकी पुकार सुनकर
कुछ और घरों को नदी ने
लील लिया था कल
लोग नदी नहीं आसमान को देखते हैं अब
कुछ सूखे बिस्किट टपक पड़ेंगे शायद
फुटपाथ पर बन रही है रसोई
आधी कच्ची रोटियों की खुशबू
खींच लाई है चंद कुत्तों को
कोने में अब भी खड़ा सोता जागता
रिक्शे वाला देख रहा है सपना
सवारियों का और उनसे जुड़े सपनो का

                                                  - अभिषेक ठाकुर

आज़ादी के नाम

किताबों के पन्ने पलटता हूँ
इंटरनेट पर दी हैं सैकड़ों परिभाषाएं
आजादी की
रट रहा हूँ
जीने की आजादी
...मजहब की आजादी
बोलने की आजादी
समान होने की आजादी
कमर में बम लपेटे
मांग रहे हैं कुछ लोग आजादी
यहाँ की आजादी
वहां से आजादी
एक कुनैन की गोली के लिए
कल मर गया था वो बस्तर के जंगलों में
इरोम शर्मीला ने दस सालों से नहीं खाया है कुछ भी
हर शहर से मिल जाया करती है लाशें अब भी
कीमत दे रहीं होतीं है जानने की
काम नहीं है उसके पास
तोड़ता रहता है शीशे
जलाता रहता है बसें
या पिघलता रहता है खुद ही
गेहूं गाँव तक नहीं पहुंचा वापस
सड़ गया इस बरसात में कहीं
कीड़े नहीं मारे उसने दवा से इस बार
ख़त्म कर ली थी जिंदगी
उसके दोस्त पानी मांग रहे थे फसलों के लिए
बंदूकें उग आई हैं अब कपास की जगह
रट रहा हूँ परिभाषाएं अब भी
दूर कहीं लाल किले पर फहरता तिरंगा
अब भी मांगता रहता है लाल लहू
बहुतों से आज भी नहीं पाया होगा
दो जून का भोजन
राजपथ से थोड़ी दूर खड़ा भिखारी
अब भी देख रहा है तिरंगे की ओर
शांत, स्निग्ध, अविचल


- अभिषेक ठाकुर