Friday, 2 December 2011

मैं मर के पूछता हूँ अपने मौत की वजहें
बुजुर्ग कहते हैं तेरा सवाल अच्छा था
समझ का फेर है आंसू और हँसती आँखें
जमाना लाख कहे अदाकर अच्छा था
उम्र भर साथ चलने का भरम पाला तू ने
घडी दो घडी को ये ख्याल अच्छा था
रौशनी देने की चाह अँधेरा न बना दे तुझको
उनसे मिले बिना तो अपना भी हाल अच्छा था
- अभिषेक ठाकुर

बिन मुड़े ही जिस शख्स ने तोड़े रिश्ते
मैं अब भी उसके लौट आने के इंतजार में हूँ
इस शहर की भीड़ में खो चुका खुद को
मकां के घर में बदल जाने के इंतजार में हूँ
अभी से उसके बारे में बोल दूं कैसे?
... उसके नकाबों के उतर जाने के इंतजार में हूँ
जिस समन्दर ने मेरी कश्ती को डूबो रखा है
उसी समन्दर के उफ़न जाने के इंतजार में हूँ
मैं उनके इश्क में जाने कब का मिट भी चुका
जो कहते हैं तेरे गुजर जाने के इंतजार में हूँ
जिन दरख्तों के साथ बचपन का नाता हो
कैसे कह दूं कि उनके ढह जाने के इंतजार में हूँ
अब के बच्चों ने सवाल करना छोड़ दिया
किसी मासूम से सवाल के इंतजार में हूँ
- अभिषेक ठाकुर