Tuesday, 24 January 2012

घर के पीछे की दीवार
सफ़ेद नहीं रह गयी है
जलते दीयों के साथ
तुम्हारा चेहरा जाने कितनी बार
उभर आता है उन पर
बारिश में भीगे मेरे मन की तरह
हर स्पर्श के बाद उसका कोई हिस्सा
रह जाता है मेरे हाथों में ही
हर कोने पर लिख दिया है तुम्हारा नाम
जिसे देख नही पाता कोई
काली स्याही से लिख दिया है नया नाम
पर बेमानी है अपनी संपत्ति बना लेने की कोशिश
अब की बरसात के बाद
तुम्हारा नाम लिख नहीं पाऊँगी कहीं
- अभिषेक ठाकुर
ये किस सफ़र के किस्से सुना रहे हैं लोग
मेरी जीत पर मातम मना रहे हैं लोग
जिन्दा रह के भी जो तडपा हो उम्र भर
उसी की मौत को खबर बना रहे हैं लोग
जो अपने घर में भी ख़ुशी ला नही सकते
जमाने को खुश करने का परचम उठा रहे हैं लोग
इश्क को जो तौला करते हैं किताबों के नाम पर
पंचायतों से इश्क करना सिखा रहे हैं लोग
इन सवालों को यूँ ही जिन्दा रखना 'अतम'
सवाल पूछने पे भी सवाल उठा रहे हैं लोग
- अभिषेक ठाकुर
यत्र नार्यस्तु जैसे झूठ के साथ
रोका गया था उन्हें शिक्षा पाने से
देवी के रूप में मानते हुए
इनकार कर दिया जाता है
उनके मोक्ष के लिए
सीता का आदर्श सिखाते वक़्त
कोई बात नहीं करता
अग्निपरीक्षा और घर से निकाले जाने की
तुम अब भी चाहते हो
मान लूं मैं
तुम्हारे आदर देते झूठे चेहरे को
- अभिषेक ठाकुर
रौशनी में देखे लेने से
भरम हो जाता है ना जान लेने का
पर घने अंधेरों में दिख जाती हैं
दीवारें
जो खड़ी की हैं रौशनी ने
पर नींद में सूरज खोजते स्वप्नों
से दूर
मैं सीख लूँगा एक दिन
भाषा
अंधेरों की
- अभिषेक ठाकुर