Tuesday, 23 April 2013

घड़ी की सुईयां वहीं थीं , समय के वैसे ही चक्कर लगाती , उसी वर्तुल पर घुमती हुई | रात कितनी उमस भरी थी , और ये कमबख्त पर्दा रह-रह कर गिर जाता है | कितनी बार तो सोचा उसने महीन जालों वाली खिड़की ला कर लगा दे , पर हर रात को इस खुले हिस्से से अंदर आते पतंगे जैसे उसकी आदत हो गये हों | जिनके बिना उसे अपनी टेबल लैंप की रौशनी अधूरी लगती थी |

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