Tuesday, 23 April 2013

नींद से बोझिल आँखों और
होश खोने के बीच
एक कोना अभी भी नितांत मेरा है
इस एक क्षण
कुछ कौंध सा जाता है हर रोज
अपने जालों के बीच मकड़ी
कुछ बड़ी सी लगती है
हटाए जाने की चिंता से बेखबर
फिर से बुन देगी कुछ और जाले
दीवाल पर टंगे नक्शे में रोज
खोजा करता हूँ अपने कस्बे का नाम
कैलेंडर के उड़ते पन्नो जैसे
वक़्त भाग रहा है कहीं
मेज पर पड़ा लैम्प
लड़ रहा है अकेले 'अन्ना' की तरह
जमीन पर रेंग रहे है कुछ सपने
नए शिकारों की तलाश में
अभिशप्त आत्माओं में
भटक रहे हैं कुछ नए सवाल
सब ने बत्तियां बुझा दी हैं
उनकी पुकार सुनकर
कुछ और घरों को नदी ने
लील लिया था कल
लोग नदी नहीं आसमान को देखते हैं अब
कुछ सूखे बिस्किट टपक पड़ेंगे शायद
फुटपाथ पर बन रही है रसोई
आधी कच्ची रोटियों की खुशबू
खींच लाई है चंद कुत्तों को
कोने में अब भी खड़ा सोता जागता
रिक्शे वाला देख रहा है सपना
सवारियों का और उनसे जुड़े सपनो का

- अभिषेक ठाकुर

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