Monday, 13 February 2012
Tuesday, 24 January 2012
घर के पीछे की दीवार
सफ़ेद नहीं रह गयी है
जलते दीयों के साथ
तुम्हारा चेहरा जाने कितनी बार
उभर आता है उन पर
बारिश में भीगे मेरे मन की तरह
हर स्पर्श के बाद उसका कोई हिस्सा
रह जाता है मेरे हाथों में ही
हर कोने पर लिख दिया है तुम्हारा नाम
जिसे देख नही पाता कोई
काली स्याही से लिख दिया है नया नाम
पर बेमानी है अपनी संपत्ति बना लेने की कोशिश
अब की बरसात के बाद
तुम्हारा नाम लिख नहीं पाऊँगी कहीं
- अभिषेक ठाकुर
ये किस सफ़र के किस्से सुना रहे हैं लोग
मेरी जीत पर मातम मना रहे हैं लोग
जिन्दा रह के भी जो तडपा हो उम्र भर
उसी की मौत को खबर बना रहे हैं लोग
जो अपने घर में भी ख़ुशी ला नही सकते
जमाने को खुश करने का परचम उठा रहे हैं लोग
इश्क को जो तौला करते हैं किताबों के नाम पर
पंचायतों से इश्क करना सिखा रहे हैं लोग
इन सवालों को यूँ ही जिन्दा रखना 'अतम'
सवाल पूछने पे भी सवाल उठा रहे हैं लोग
- अभिषेक ठाकुर
Friday, 2 December 2011
बिन मुड़े ही जिस शख्स ने तोड़े रिश्ते
मैं अब भी उसके लौट आने के इंतजार में हूँ
इस शहर की भीड़ में खो चुका खुद को
मकां के घर में बदल जाने के इंतजार में हूँ
अभी से उसके बारे में बोल दूं कैसे?
... उसके नकाबों के उतर जाने के इंतजार में हूँ
जिस समन्दर ने मेरी कश्ती को डूबो रखा है
उसी समन्दर के उफ़न जाने के इंतजार में हूँ
मैं उनके इश्क में जाने कब का मिट भी चुका
जो कहते हैं तेरे गुजर जाने के इंतजार में हूँ
जिन दरख्तों के साथ बचपन का नाता हो
कैसे कह दूं कि उनके ढह जाने के इंतजार में हूँ
अब के बच्चों ने सवाल करना छोड़ दिया
किसी मासूम से सवाल के इंतजार में हूँ
- अभिषेक ठाकुर
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