Wednesday, 19 September 2012

पढ़ रहा हूँ
तुम्हारा नाम
उदास के एक गीत की तरह
पहला अक्षर.............
पत्तों के अलग हो जाने की कहानी
और अकेली दोपहरों की धूप सा है
छाँव की तलाश
बेमानी हो चुकी है
अंतहीन दिन से
थक जाती है

पंखे के चलने की आवाज
.................
- अभिषेक ठाकुर
ताजे उगे बुरांस के फूलों सी
रात
समेट ली है मैंने अपनी आँखों में
और अपने शहर के क्षितिज पर
फैला दिया है
सुनहरी यादों को
पर तुम्हारे शहर में
रात जाने कैसे
बदल गयी है
अनंत पीड़ा में

गमले में उगे नन्हे पौधे
की जिद
से
चाँद खिंच आया है
शायद थोडा और करीब
आज की रात
घिर आने दो
थोड़े से और बादलों को
और ढक लेने दो
उस दीवार को
जो पनप आई है
रात के बीच
- अभिषेक ठाकुर
आज शाम घिर आएगी
कुछ जल्दी ही
समन्दर किनारे की पीली रेत से
मिट चुकी होगी हमारी हथेलियों की छाप
लहरों ने फेंक दिए हैं
सीपियाँ और कुछ रंग बिरंगे पत्थर
जिन्हें हाथों में भर
खुश हो जाएगा
एक नन्हा सा बच्चा
और हम हँस देंगे उसकी मासूमियत पर

और भूल जायेंगे दुखती हुई सांसों
और हथेलियों के बीच पिघलती हुई ऊष्मा को
- अभिषेक ठाकुरआज शाम घिर आएगी
कुछ जल्दी ही
समन्दर किनारे की पीली रेत से
मिट चुकी होगी हमारी हथेलियों की छाप
लहरों ने फेंक दिए हैं
सीपियाँ और कुछ रंग बिरंगे पत्थर
जिन्हें हाथों में भर
खुश हो जाएगा
एक नन्हा सा बच्चा
और हम हँस देंगे उसकी मासूमियत पर
और भूल जायेंगे दुखती हुई सांसों
और हथेलियों के बीच पिघलती हुई ऊष्मा को
- अभिषेक ठाकुर

Thursday, 1 March 2012

नींद से भरी पलकों
के दर पर नींद का ना
आना अजीब सा है
और उतना ही अजीब है
अपने लगाये हरसिंगार
के पौधे की इंच दर इंच
बढती पत्तियों को
देखना
और इंतजार करते रहना
उस पहले फूल का
जो बन जाता है प्रतीक
सृजन का
पर तुम हँस देती हो
हैरान नहीं होती
इन में से किसी बात पर
और सोचती हो
तितलियों के पंखों
के रंगों के बारे में
और खोजती हो
नक्शों पर
परियों के देश को
सच !
कितना अजीब है ना
नींद का पलकों पर आना
और विदा हो जाना चुप चाप
- अभिषेक ठाकुर
मैंने अधिकार दे दिया है
शब्दों को रूठ जाने का
और बना लिया है अपना घर
नदी की बहाव से दूर
टहलती नींद
कर देती है इनकार
मेरी आँखों से गुजर कर जाने से
और खो जाती है
नदी किनारे उगे झुरमुटों में
- अभिषेक ठाकुर

पीला चाँद



इक शाम,
पीले चाँद की ऊँगली थामे
कुछ यादें मुझसे मिलने आयीं थीं
उदासी का एक गीत
जिसमें 'तुम ' नहीं
तुम्हारा ना होना था
हमने साथ गुनगुनाया
एक कहानी जिसमें
कोई राजा या रानी नही थीं
थे सिर्फ गुलाम
अपनी इच्छाओं की गठरी ढ़ोते
कुछ रोते और टुकड़ों में जीते
वे खोजा करते हैं -
रेगिस्तान की पीली रेत में
पीले चाँद का अक्स
बरसों पहले
तुम्हारी बातों की ऊँगली थामे
चाँद मेरे गाँव के तालाब में
उतर आता था
ताकि धुल सके
अपने चेहरे का पीलापन
आज भी चाँद पीला ही है
और मैं इंतजार कर रहा हूँ बिन सोए
पीले रंग की केंचुल उतरने का
- अभिषेक ठाकुर

Monday, 13 February 2012

भटकता फिरता हूँ राहों में नाम लेता हूँ
तेरी अहद की ख़ातिर मैं ज़ाम लेता हूँ
तिश्नगी से ही जब प्यास बुझे होंठों की
भरी दरिया को ही इक सहरा बना लेता हूँ
- अभिषेक ठाकुर