Friday, 2 December 2011

मैं मर के पूछता हूँ अपने मौत की वजहें
बुजुर्ग कहते हैं तेरा सवाल अच्छा था
समझ का फेर है आंसू और हँसती आँखें
जमाना लाख कहे अदाकर अच्छा था
उम्र भर साथ चलने का भरम पाला तू ने
घडी दो घडी को ये ख्याल अच्छा था
रौशनी देने की चाह अँधेरा न बना दे तुझको
उनसे मिले बिना तो अपना भी हाल अच्छा था
- अभिषेक ठाकुर

बिन मुड़े ही जिस शख्स ने तोड़े रिश्ते
मैं अब भी उसके लौट आने के इंतजार में हूँ
इस शहर की भीड़ में खो चुका खुद को
मकां के घर में बदल जाने के इंतजार में हूँ
अभी से उसके बारे में बोल दूं कैसे?
... उसके नकाबों के उतर जाने के इंतजार में हूँ
जिस समन्दर ने मेरी कश्ती को डूबो रखा है
उसी समन्दर के उफ़न जाने के इंतजार में हूँ
मैं उनके इश्क में जाने कब का मिट भी चुका
जो कहते हैं तेरे गुजर जाने के इंतजार में हूँ
जिन दरख्तों के साथ बचपन का नाता हो
कैसे कह दूं कि उनके ढह जाने के इंतजार में हूँ
अब के बच्चों ने सवाल करना छोड़ दिया
किसी मासूम से सवाल के इंतजार में हूँ
- अभिषेक ठाकुर

Monday, 28 November 2011

अक्सर तुम मुझसे कहा करती थी
सब कुछ बदल जाता है
वक़्त की आंधी उड़ा देती है सब कुछ
लेकिन आकर देखो प्रिय
मैं अब भी वैसा ही हूँ
कुछ बनाने की कोशिश में
घर के बर्तन अब भी टूटा करते हैं
भूखे पेट सो जाता हूँ चुपचाप
तुम्हारा नाम उखड़े प्लास्टर के बीच
अब भी वैसा ही चमका करता है
तुम्हारे हाथों के निशान
अब भी मुझे देखा करते हैं
घडी की सुइयों में
वक़्त को  खोजते हुए.
  -अभिषेक ठाकुर
जिंदगी बिना बनावट के मैं गुजारूँ कैसे
खुदाया मेरे यार को दुकानों से प्यार ज्यादा है
वो मेरे जज्बात समझने कि कोशिश भी कर नहीं पाते
मेरे उस्तादों को लिखावट से प्यार ज्यादा है
क्यूँ ना खुद को छुपा कर ओढ़ लूं चेहरे
जब सारी दुनिया को सजावट से प्यार ज्यादा है
ये सारे इंतजाम बस धरे रह जायेंगे
मेरी नींदों को थकावट से प्यार ज्यादा है
- अभिषेक ठाकुर
अस्पताल के बिस्तर से
धूप पूरी नहीं दिखा करती
दिन का होना
तो बस मरीजों की भीड़ से पता चलता है
सफ़ेद दीवारों से टकरा कर रंग
बिखर बिखर से जाते हैं
बिस्तर पर तुम्हे सोचता हूँ
और दवाइयों से आधी खुली आँखों
तुमको खिड़की के पार खोजा करती हैं
तुमने सफ़ेद कपडे पहने होंगे शायद
इसलिए धूप भी अब सतरंगी नहीं लगती
- अभिषेक ठाकुर
कुछ रास्ते
सिर्फ हम दोनों को तय करने थे
रोते, झगड़ते
एक दूसरे को खींचते
किनारे लगे बबूल के काँटों को
अपने चलने का सबूत देते
लेकिन,
लेकिन अब हमने छोड़ दिया है
एक दूसरे को सहारा देना
और बाँट लिए हैं
बबूल अपने हिस्से के
- अभिषेक ठाकुर
पुरानी बेंच पर हाथ फिराना
कुछ अजीब सा लगता है
अनगढ़ ढंग से उकेरे नाम
मानो चेहरे पर पड़ी झुर्रियों कि तरह
मिटना ही नहीं चाहते
और उन अनबोले किस्सों कि तरह
बस याद दिलाना जानते हैं.
- अभिषेक ठाकुर