Monday, 13 February 2012

भटकता फिरता हूँ राहों में नाम लेता हूँ
तेरी अहद की ख़ातिर मैं ज़ाम लेता हूँ
तिश्नगी से ही जब प्यास बुझे होंठों की
भरी दरिया को ही इक सहरा बना लेता हूँ
- अभिषेक ठाकुर
साथी
लो फेंक दिए हैं मैंने अपने पंख
जो दूर ले जाया करते थे मुझे
तुमसे
गुनगुनी धूप पीछे छोड़ आया हूँ
ताकि तुम्हारी पीड़ा पिघल न जाये
उड़ने और सतरंगे सपनो की चाभी
खो दी है मैंने
साथी
अलग नहीं होगा
रंग हम दोनों के रक्त का
उजाले छोड़ दिए हैं मैंने
और कर ली है दोस्ती
तुम्हारी जिंदगी के अंधेरों से
- अभिषेक ठाकुर

Tuesday, 24 January 2012

घर के पीछे की दीवार
सफ़ेद नहीं रह गयी है
जलते दीयों के साथ
तुम्हारा चेहरा जाने कितनी बार
उभर आता है उन पर
बारिश में भीगे मेरे मन की तरह
हर स्पर्श के बाद उसका कोई हिस्सा
रह जाता है मेरे हाथों में ही
हर कोने पर लिख दिया है तुम्हारा नाम
जिसे देख नही पाता कोई
काली स्याही से लिख दिया है नया नाम
पर बेमानी है अपनी संपत्ति बना लेने की कोशिश
अब की बरसात के बाद
तुम्हारा नाम लिख नहीं पाऊँगी कहीं
- अभिषेक ठाकुर
ये किस सफ़र के किस्से सुना रहे हैं लोग
मेरी जीत पर मातम मना रहे हैं लोग
जिन्दा रह के भी जो तडपा हो उम्र भर
उसी की मौत को खबर बना रहे हैं लोग
जो अपने घर में भी ख़ुशी ला नही सकते
जमाने को खुश करने का परचम उठा रहे हैं लोग
इश्क को जो तौला करते हैं किताबों के नाम पर
पंचायतों से इश्क करना सिखा रहे हैं लोग
इन सवालों को यूँ ही जिन्दा रखना 'अतम'
सवाल पूछने पे भी सवाल उठा रहे हैं लोग
- अभिषेक ठाकुर
यत्र नार्यस्तु जैसे झूठ के साथ
रोका गया था उन्हें शिक्षा पाने से
देवी के रूप में मानते हुए
इनकार कर दिया जाता है
उनके मोक्ष के लिए
सीता का आदर्श सिखाते वक़्त
कोई बात नहीं करता
अग्निपरीक्षा और घर से निकाले जाने की
तुम अब भी चाहते हो
मान लूं मैं
तुम्हारे आदर देते झूठे चेहरे को
- अभिषेक ठाकुर
रौशनी में देखे लेने से
भरम हो जाता है ना जान लेने का
पर घने अंधेरों में दिख जाती हैं
दीवारें
जो खड़ी की हैं रौशनी ने
पर नींद में सूरज खोजते स्वप्नों
से दूर
मैं सीख लूँगा एक दिन
भाषा
अंधेरों की
- अभिषेक ठाकुर

Friday, 2 December 2011

मैं मर के पूछता हूँ अपने मौत की वजहें
बुजुर्ग कहते हैं तेरा सवाल अच्छा था
समझ का फेर है आंसू और हँसती आँखें
जमाना लाख कहे अदाकर अच्छा था
उम्र भर साथ चलने का भरम पाला तू ने
घडी दो घडी को ये ख्याल अच्छा था
रौशनी देने की चाह अँधेरा न बना दे तुझको
उनसे मिले बिना तो अपना भी हाल अच्छा था
- अभिषेक ठाकुर