Thursday, 29 September 2011

अतीत और वर्तमान

पत्तों की तरह
अब  भी मेरे होंठ कांप जाते हैं
कुछ कह नहीं पता
दर्द से झुकी पलकें
सोने से डरा करतीं हैं
अब भी
तुम्हारा लगाया पेड़
गिर गया है अब की बारिश में
रात अब भी वैसी ही है
छोड़ कर गयी थी तुम जहाँ
सूरज नहीं देखा मैंने तब से
तुम्हारे नाम के सिवा
कुछ लिखता नहीं अब अपनी डायरी में
सारे पन्ने भर चुके हैं तुम्हारे नाम से
बिस्तर पर सोता नहीं
इस डर से कहीं तुम्हारे जिस्म की
सिलवटें मिट न जायें बेख्याली में
आइना तुम्हारा अक्स नहीं दिखाता अब
तोड़ दिए थे कल सारे आईने मैंने
मैंने साँस लेना छोड़ दिया है
तुम जी रही हो  मेरे अंदर
सुन लिया करता हूँ
तुम्हारी सांसों की आवाज
और तुम्हारी बढती धडकनों को
                  - अभिषेक ठाकुर

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