Wednesday, 19 September 2012

सडकें कहीं पहुंचती नहीं
बस जोड़ देती हैं
बिकती मूंगफलियों
को धूल और रात में जलते
चूल्हे के साथ
उस पार नगर निगम का नल
रोज बच जाता है
खुद की उगाई फिसलन से
और उगल देता है
दूध अलसुबह ही

जब सड़क सोने की कोशिश करती है
एक दूधिया जोड़ रहा होता है
प्लास्टिक में छुपी डायरी में
बगल वाले गुप्ता जी का हिसाब
बीच का गड्ढा नया आया लगता है
ऑटो चलता गुड्डू
याद करता है बाकि बची सवारियों को
किनारे खड़े खम्भे से एक तार
उतर आया था नीचे
पिछली बारिश में
फोटू भी तो खींचे थे ना
पहचान लिया था जीवन जर्नल स्टोर
वाले ने
सड़क को अख़बार में
सड़क समेट नही पाती
अब
खुद पर से गुजरते लोगों को
किनारे का फुटपाथ टूटता है
मूंगफलियाँ खुश हैं
रामदीन सोचता है
गाँव का बिस्तर खाली
ही रह जाता होगा
- अभिषेक ठाकुर

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